सुनो तो बोलता है जागता धड़कता है
ग़ज़ल के सीने में मिसरा मेरा धड़कता है
है इज़्तिराब-ओ-तवाज़ुन के तालमेल से शे'र
रदीफ़ ठहरी हुई है क़ाफ़िया धड़कता है
क़दम की छाप से ले कर लहू की लर्ज़िश तक
ख़फ़ी ख़फ़ी कोई आसेब सा धड़कता है
नवाह-ए-दिल किसी हलचल पे आँख फड़की है
कहाँ का वहम है और किस जगह धड़कता है
है आँख अपने ही पानी में डूब कर ज़िंदा
दिल अपने मलबे के नीचे पड़ा धड़कता है
— Abid Sial















