जो चाहो वो मिलता कहाँ
कोई मिरा अपना कहाँ
कोशिश तो की समझाने की
पर दुनिया ने समझा कहाँ
नज़्में ही लिखता रहता है
वो ग़ज़लें अब कहता कहाँ
रोते ही रहते हैं सभी
खुलकर कोई हँसता कहाँ
सब कुछ बदलता मिनटों में
इस जग में कुछ पक्का कहाँ
— Adarsh Akshar
कोई मिरा अपना कहाँ
कोशिश तो की समझाने की
पर दुनिया ने समझा कहाँ
नज़्में ही लिखता रहता है
वो ग़ज़लें अब कहता कहाँ
रोते ही रहते हैं सभी
खुलकर कोई हँसता कहाँ
सब कुछ बदलता मिनटों में
इस जग में कुछ पक्का कहाँ
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