"अजनबी लड़का"
तुम्हारी उम्र के बारे में क्या जानूँ
मैं कोई अजनबी लड़का
जो इक दुनिया में रहता है
जो उस ने ख़ुद बनाई है
न जिस
में शाम होती है
न जिस
में रात होती है
फ़क़त तन्हाई होती है
फ़क़त बरसात होती है
उसी बरसात में भीगा हुआ सहमा हुआ लड़का
न तुझ को याद करता है
न तुझ को भूल पाता है
बड़ी संजीदगी से ग़म छुपा लेता है अपना और
ये ऑंसू बारिशों की आड़ में ख़ुद बह निकलते हैं
न कोई देख पाता है न कोई जान पाता है
ये बारिश है कि आँसू हैं
मगर ये भी हक़ीक़त है
कि तुम हो इक गुलाबी फूल की कोमल कली जैसी
मैं भँवरा वही भँवरा जो है रंगों का दीवाना
सो पहली मर्तबा देखा
तो तुम से प्यार कर बैठा
दिल-ए-नादाँ
मगर उस को कहाँ ये इल्म था तुम और ही कुछ हो
हो कोई हूर जन्नत की हो कोई अप्सरा शायद
मगर हम सब तो बस अंबर को अपनी छत समझते हैं
हमारे पास है ही क्या
हमीं वो लोग हैं जिन का
न कोई घर
न कोई जात कोई धर्म होता है
सो बस जीते हैं तो ये सोच कर मरने में बाक़ी हैं
अभी दो चार दिन तब तक
तुम्हीं से इश्क़ करते हैं
मैं वाक़िफ़ हूँ कि तुम भी ख़ूब-सूरत हो
मगर मैं भी बहुत ज़िद्दी
सो बस तुम से मुहब्बत की
तुम्हें देखा
फ़क़त देखा
तुम्हारी उम्र क्या है क्यूँ
कहाॅं रहती हो इस से मुझ को मतलब क्या
मुझे तो बस मुहब्बत है
मैं कोई वैद्य थोड़ी हूँ
जो तुम को देख कर तुम को बता दूँगा
तुम्हारी उम्र कितनी है
तुम्हारी उम्र के बारे में क्या जानूँ
मैं कोई अजनबी लड़का















