है उसी शहर की गलियों में क़याम अपना भी

एक तख़्ती पे लिखा रहता है नाम अपना भी

भीगती रहती है दहलीज़ किसी बारिश में
देखते देखते भर जाता है जाम अपना भी

एक तो शाम की बे-मेहर हवा चलती है
एक रहता है तिरे कू में ख़िराम अपना भी

कोई आहट तिरे कूचे में महक उठती है
जाग उठता है तमाशा किसी शाम अपना भी

एक बादल ही नहीं बार-ए-गराँ से नालाँ
सरगिराँ रहता है इक ज़ोर कलाम अपना भी

कोई रस्ता मिरे वीराने में आ जाता है
उसी रस्ते से निकलता है दवाम अपना भी

एक दिल है कि जिसे याद हैं बातें अपनी
एक मय है कि जिसे रास है जाम अपना भी

यूँही लोगों के पस-ओ-पेश में चलते चलते
गर्द उड़ती है बिखर जाता है नाम अपना भी

मुब्तला कार-ए-शब-ओ-रोज़ में है शहर 'नवेद'
और इसी शहर में गुम है कोई काम अपना भी

— Afzaal Naveed

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