musalsal dar pe aane lag rahe hain | मुसलसल दर पे आने लग रहे हैं

  - Afzal Sultanpuri

मुसलसल दर पे आने लग रहे हैं
तिरे दर के दीवाने लग रहे हैं

मिरे मुर्शिद सुनो अरदास मेरी
कि मुर्शिद सब सताने लग रहे हैं

कहाँ जाऊँ रहूँगा किस जगह मैं
मुझे पागल चिढ़ाने लग रहे हैं

तुम्हारी आँख है याक़ूत जैसी
मुझे क़लमा पढ़ाने लग रहे हैं

मुसल्ले पर खड़ा होना है मुश्किल
क़दम ये डगमगाने लग रहे हैं

कि मैंने कह दिया बस जोड़ देना
सभी मिलकर घटाने लग रहे हैं

चमकते चाँद पर है दाग़ कैसा
किसे डर कर छुपाने लग रहे हैं

कभी अफ़ज़ल हमारी बात सुनता
कि दुश्मन के निशाने लग रहे हैं

  - Afzal Sultanpuri

Chaand Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Afzal Sultanpuri

As you were reading Shayari by Afzal Sultanpuri

Similar Writers

our suggestion based on Afzal Sultanpuri

Similar Moods

As you were reading Chaand Shayari Shayari