दीदा-ए-यार ने बर्बाद किया है मुझ को
था बहुत शाद कि ना-शाद किया है मुझ को
पेड़ तो पेड़ यहाँ लोगों में भी जान नहीं
तू ने किस शहर में आज़ाद किया है मुझ को
मुझ
में भी अम्न बसा करती थी पहले पहले
मेरे हालात ने जल्लाद किया है मुझको।
तुझ को क्या इल्म हो, क्या हाल हुआ है तिरे बा'द
तेरी यादों ने बहुत याद किया है मुझ को
तू मिरे सब्र के दर्जात की तस्दीक़ न कर
एक गाने ने भी ना-शाद किया है मुझ को
— Faiz Ahmad















