तिरे जाने का मिरा गैज़ कम नहीं हो रहा
कि गुनाह कर के भी कोई ग़म नहीं हो रहा
दिल-ए-बद-हवा से को आप समझा तो सकते थे
मगर आप से भी ये मोहतरम नहीं हो रहा
मुझे लगता था तुझे भूलना मिरे बस में हैं
मगर ऐ निग़ार तिरी क़सम नहीं हो रहा
लब-ए-सुर्ख़-लाल से चूम ले कि असर करे
लब-ए-पारसा से तो कोई दम नहीं हो रहा
तू वजह नहीं है सुख़न की ये मिरा शौक़ है
तू यक़ीन कर मुझे कोई ग़म नहीं हो रहा
— Faiz Ahmad















