jab main apno ki hi mehfil men bulaayaa na gaya | जब मैं अपनो की ही महफ़िल में बुलाया ना गया

  - ''Akbar Rizvi"

जब मैं अपनो की ही महफ़िल में बुलाया ना गया
मुझ सेे वो लम्हा तो हरगिज़ भी भुलाया ना गया

दर्दे दिल पूछा था एक शख़्स ने आकर मुझ सेे
जब सुनाने लगा तो मुझ सेे सुनाया न गया

उस ज़मींदार की दौलत पा ख़ुदा हो लानत
जिस सेे एक भूके को खाना भी खिलाया न गया

जिस्म से आती है मेरे जो ग़रीबी की महक
इसलिए ईद को सीने से लगाया न गया

मुल्क़ का ख़ुद को निगहबान जो तू कहता है
तुझ सेे एक जलता हुआ घर भी बचाया न गया

इस क़दर ख़ून में डूबा था जिगर का टुकड़ा
माँ से आग़ोश में बच्चे को लिटाया न गया

आख़री वक़्त भी मक़तूल ने माँगा पानी
और क़ातिल से उसे आब पिलाया न गया

उंगलियाँ जिस सेे उठाये न ज़माना अकबर
तुझ सेे किरदार अभी ऐसा बनाया न गया

  - ''Akbar Rizvi"

Khuda Shayari

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