ये दिल कहता है कोई आ रहा है

नज़र कहती है वो बहला रहा है

हर इक के दिल पे करता है हुकूमत
वो अपनी सल्तनत फैला रहा है

किसी की दस्तरस में है मगर वो
कभी आ कर हमें मिलता रहा है

कभी देता है दिल को ज़ख़्म गहरे
कभी लगता है वो सहला रहा है

ख़बर इक उस के आने की सुनी थी
दिया घर रात भर जलता रहा है

कहेंगे लोग मेरे बा'द सारे
वो जैसा भी रहा अच्छा रहा है

कहाँ पर आ के 'अख़्तर' रुक गए हो
चलो आओ ज़माना जा रहा है

— Akhtar Amaan

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