agar vo apne haseen chehre ko bhool kar be-naqaab kar de | अगर वो अपने हसीन चेहरे को भूल कर बे-नक़ाब कर दे

  - Akhtar Shirani

अगर वो अपने हसीन चेहरे को भूल कर बे-नक़ाब कर दे
तो ज़र्रे को माहताब और माहताब को आफ़्ताब कर दे

तिरी मोहब्बत की वादियों मेंं मिरी जवानी से दूर क्या है
जो सादा पानी को इक नशीली नज़र मेंं रंगीं शराब कर दे

हरीम-ए-इशरत मेंं सोने वाले शमीम-ए-गेसू की मस्तियों से
मिरी जवानी की सादा रातों को अब तो सरशार ख़्वाब कर दे

मज़े वो पाए हैं आरज़ू मेंं कि दिल की ये आरज़ू है यारब
तमाम दुनिया की आरज़ूएँ मिरे लिए इंतिख़ाब कर दे

नज़र ना आने पे है ये हालत कि जंग है शैख़-ओ-बरहमन मेंं
ख़बर नहींं क्या से क्या हो दुनिया जो ख़ुद को वो बे-नक़ाब कर दे

मिरे गुनाहों की शोरिशें इस लिए ज़ियादा रही हैं यारब
कि इन की गुस्ताख़ियों से तू अपने अफ़्व को बे-हिसाब कर दे

ख़ुदा न लाए वो दिन कि तेरी सुनहरी नींदों मेंं फ़र्क़ आए
मुझे तो यूँँ अपने हिज्र मेंं उम्र भर को बेज़ार-ए-ख़्वाब कर दे

मैंंं जान-ओ-दिल से तसव्वुर-हुस्न-ए-दोस्त की मस्तियों के क़ुर्बां
जो इक नज़र मेंं किसी के बे-कैफ़ आँसुओं को शराब कर दे

उरूस-ए-फ़ितरत का एक खोया हुआ तबस्सुम है जिस को 'अख़्तर'
कहीं वो चाहे शराब कर दे कहीं वो चाहे शबाब कर दे

  - Akhtar Shirani

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