dil-e-mahjoor ko taskin ka saamaan na mila | दिल-ए-महजूर को तस्कीन का सामाँ न मिला

  - Akhtar Shirani

दिल-ए-महजूर को तस्कीन का सामाँ न मिला
शहर-ए-जानाँ में हमें मस्कन-ए-जानाँ न मिला

कूचा-गर्दी में कटीं शौक़ की कितनी रातें
फिर भी उस शम-ए-तमन्ना का शबिस्ताँ न मिला

पूछते मंज़िल-ए-सलमा की ख़बर हम जिस से
वादी-ए-नज्द में ऐसा कोई इंसाँ न मिला

यूँ तो हर राहगुज़र पर थे सितारे रक़्साँ
जिस की हसरत थी मगर वो मह-ए-ताबाँ न मिला

लाला-ओ-गुल थे बहुत आम चमन में लेकिन
ढूँडते थे जिसे वो सर्व-ए-ख़िरामाँ न मिला

जिस के पर्दों से मचलती हो वही निकहत-ए-शौक़
बे-ख़ुदी की क़सम ऐसा कोई ऐवाँ न मिला

बख़्त-ए-बे-दार कहाँ जल्वा-ए-दिल-दार कहाँ
ख़्वाब में भी हमें वो गुंचा-ए-ख़ंदाँ न मिला

बेकसी तिश्ना-लबी दर्द-ए-हलावत-तलबी
चाँदनी-रात में भी चश्मा-ए-हैवाँ न मिला

यूँ तो हर दर पे ही कहते नज़र आए दामन
खींचते नाज़ से जिस को वही दामाँ न मिला

किस के दर पर न किए सज्दे निगाहों ने मगर
हाए तक़दीर वो ग़ारत-गर-ए-ईमाँ न मिला

कौन से बाम को रह रह के न देखा लेकिन
निगह-ए-शौक़ को वो माह-ए-ख़िरामाँ न मिला

दर-ए-जानाँ पे फ़िदा करते दिल-ओ-जाँ 'अख़्तर'
वाए बर-हाल-ए-दिल-ओ-जाँ दर-ए-जानाँ न मिला

  - Akhtar Shirani

Insaan Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Akhtar Shirani

As you were reading Shayari by Akhtar Shirani

Similar Writers

our suggestion based on Akhtar Shirani

Similar Moods

As you were reading Insaan Shayari Shayari