अभी और तेज़ कर ले सर-ए-ख़ंजर-ए-अदा को

मिरे ख़ूँ की है ज़रूरत तिरी शोख़ी-ए-हिना को

तुझे किस नज़र से देखे ये निगाह-ए-दर्द-आगीं
जो दुआएँ दे रही है तिरी चश्म-ए-बेवफ़ा को

कहीं रह गई हो शायद तिरे दिल की धड़कनों में
कभी सुन सके तो सुन ले मिरी ख़ूँ-शुदा नवा को

कोई बोलता नहीं है मैं पुकारता रहा हूँ
कभी बुत-कदे में बुत को कभी का'बे में ख़ुदा को

— Ali Sardar Jafri

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