"हदें"
किसी को मुहब्बत में कब सूझता है
वो क्या पा रहा है, वो क्या खो रहा है
तुझे जिस बुलंदी पे मैं देखता हूँ
कोई इतनी पस्ती से कब देखता है
किसी से सुना ये शरर है वहाँ भी
वहम ही हो शायद सुकूँ लग रहा है
हूँ इतना अली ख़ुश के अब मेरे दिल का
पता सारी दुनिया का ग़म पूछता है
— Ali Mohammed Shaikh















