ख़ुश-रंग-ओ-सहर-कार नज़ारों को क्या हुआ

अल्लाह इस चमन की बहारों को क्या हुआ

रौशन थीं जिन से बज़्म-ए-तसव्वुर की ख़ल्वतें
इन रश्क-ए-मेहर-ओ-माह सितारों को क्या हुआ

साहिल को पा सकी न कभी कश्ती-ए-हयात
दरिया-ए-आरज़ू के किनारों को क्या हुआ

अपने पराए हो गए क़िस्मत के साथ साथ
मजबूर ज़िंदगी के सहारों को क्या हुआ

नग़्मा ब-लब हूँ और न नाला ब-लब हूँ मैं
साज़-ए-जुनून-ओ-इश्क़ के तारों को क्या हुआ

लब-हा-ए-लाला-गूँ हैं और इक तल्ख़ी-ए-इताब
मीठे तबस्सुमों की फुवारों को क्या हुआ

मुद्दत से गुलिस्ताँ है ब-रंग-ए-रुख़-ए-मरीज़
'अलताफ़' सुर्ख़ सुर्ख़ बहारों को क्या हुआ

— Altaf Mashhadi

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