ख़िज़ाँ से मानूस हो चुके हैं नहीं ख़बर कुछ बहार क्या है

तड़प की लज़्ज़त है जिन को हासिल नज़र में उन की क़रार क्या है

बचेगा कब तक ग़रीब इंसाँ हवादिस-ए-गर्दिश-ए-ज़माँ से
हवा के झोंकों में जल सकेगा चराग़ ये ए'तिबार क्या है

क़रीब हो कर भी दूर हैं जैसे एक दरिया के दो किनारे
यूँही गुलिस्ताँ में रह के भी हम नहीं हैं वाक़िफ़ बहार क्या है

चमन के हो कर जो जी रहे हैं ख़िज़ाँ है रश्क-ए-बहार उन की
परस्तिश-ए-गुल्सिताँ ही ठहरी तो फ़र्क़-ए-ग़ुंचा-ओ-ख़ार क्या है

नशात-ए-वस्ल-ओ-शराब-ए-दीदार पर जो कम-ज़र्फ़ मुतमइन हैं
उन्हें कोई किस तरह बताए तअ'य्युश-ए-इंतिज़ार क्या है

ख़ुदा-रा 'अलताफ़' मुझ से अहबाब मेरी तन्हाइयाँ न छीनें
ग़मों के होते हुए किसी को ज़रूरत-ए-ग़म-गुसार क्या है

— Altaf Mashhadi

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