आ चल के बसें हम-दम-ए-दैरीना कहीं और

मैं ढूँढ़ निकालूँगा फ़लक और ज़मीं और

बचती हुई नज़रों से टपकते हैं फ़साने
ईजाद तकल्लुम की हुई तर्ज़-ए-हसीं और

गुल्हा-ए-तबस्सुम पे नज़र डालने वाले
इन होंठों में पिन्हाँ हैं कई ख़ुल्द-ए-बरीं और

ज़ौ-बार-ओ-दरख़्शाँ है ये अनवार-ए-ख़ुदी से
सज्दों की सियाही को है मतलूब जबीं और

इक अश्क में तब्दील हुआ अपना सरापा
कुछ माँग ले उल्फ़त से मिरी जान-ए-हज़ीं और

ज़ुल्फ़ों को ज़रा और भी आँखों पे झुका दो
मयख़ाने से बादल को करो कुछ तो क़रीं और

'अलताफ़' मुझे जिस ने दिया दर्द-ए-मोहब्बत
उस आँख में क्या ऐसी कोई चीज़ नहीं और

— Altaf Mashhadi

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