बहर-ए-हस्ती कोई सराब नहीं
ज़िंदगी ज़िंदगी है ख़्वाब नहीं
आह इंसान जिस की आँखों पर
अपना अंजाम बे-नक़ाब नहीं
एक ख़ुर्शीद-रुख़ की ज़ुल्फ़ों का
रात के पास कुछ जवाब नहीं
ज़िंदगी दर्द से हुई महरूम
मै-कदा है मगर शराब नहीं
मुतरिब-ए-वक़्त तेरे हाथों में
क्यूँ है तलवार और रबाब नहीं
आदमी आदमी का राज़िक़ है
नज़्म-ए-आलम मगर ख़राब नहीं
हाए 'अलताफ़' वो हज़ीं रातें
जिन की क़िस्मत में माहताब नहीं
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