किसी फूल से दोस्ती हो गई है
मेरी ज़िंदगी ज़िन्दगी हो गई है
मियाॅं दोस्त तो दोस्ती पर टिका है
हमें दोस्त से दिल-लगी हो गई है
उसे पाना ही अब तो तरजीह है बस
बची शय हर एक आरज़ी हो गई है
तुम्हें भी है क्या ये मुहब्बत जो तुम से
मुझे पहली और आख़िरी हो गई है
तुम्हें सोच मतला लिखा था ग़ज़ल का
मुकम्मल मेरी शा'इरी हो गई है
— Aman Deep singh















