"तुम आओगे ना"
भले हमारे बीच में हो दूरियाँ सही
न मिलने की लाख मजबूरियाँ सही
ख़फ़ा हो गई हो ये मौसम की डाली
रंगत को तरसे होंठों की लाली
जब बिखरी सी लागे मुझे ज़िंदगानी
तुम्हें ही पुकारे ये नैनन का पानी
जब कोई आस न दिखे तुम्हारे आने की
इन सभियों को झुठलाओगे ना?
तुम आओगे ना
तुम आओगे ना?
कुछ ख़ास नहीं है ख़्वाहिश मेरी
बस इतनी सी दुआ रहती सदा रहती है
कि मेरी नादानियाँ, मेरी बचकानियाँ
हमारे बीच की मिठास को खारा न करे
बेचैनियों की आफ़त का इशारा न करे
न हो कभी भी ख़फ़ा, वफ़ा हम से
किन्हीं कारणों से जो मैं रूठ जाऊँ
मनाओगे ना?
तुम आओगे ना?
— Ambar















