jab se zindagi hua dil gardish-e-taqdeer ka | जब से ज़िंदगी हुआ दिल गर्दिश-ए-तक़दीर का

  - Ambreen Haseeb Ambar

जब से ज़िंदगी हुआ दिल गर्दिश-ए-तक़दीर का
रोज़ बढ़ जाता है इक हल्क़ा मिरी ज़ंजीर का

मेरे हिस्से में कहाँ थीं उजलतों की मंज़िलें
मेरे क़दमों को सदा रस्ता मिला ताख़ीर से

किस लिए बर्बादियों का दिल को है इतना मलाल
और क्या अंदाज़ा हो ख़म्याज़ा-ए-ता'मीर का

ख़ून-ए-दिल जिन की गवाही में हुआ नज़्र-ए-वफ़ा
रंग तो वो उड़ गए अब क्या करूँँ तस्वीर का

मैं ने समझा तेरी चाहत को फ़क़त इनआ'म-ए-ज़ीस्त
मुझ को अंदाज़ा न था इस जुर्म इस ता'ज़ीर का

एक लब तक ही न पहुँची जो दुआ थी मुस्तजाब
किस क़दर चर्चा हुआ है आह-ए-बे-तासीर का

लफ़्ज़ की हुरमत मुक़द्दम है दिल-ओ-जाँ से मुझे
सच तआरुफ़ है मिरे हर शे'र हर तहरीर का

  - Ambreen Haseeb Ambar

Sach Shayari

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