चलते चलते ये गली बे-जान होती जाएगी

रात होती जाएगी सुनसान होती जाएगी

देखना क्या है नज़र-अंदाज़ करना है किसे
मंज़रों की ख़ुद-ब-ख़ुद पहचान होती जाएगी

उस के चेहरे पर मुसलसल आँख रुक सकती नहीं
आँख बार-ए-हुस्न से हलकान होती जाएगी

सोच लो ये दिल-लगी भारी न पड़ जाए कहीं
जान जिस को कह रहे हो जान होती जाएगी

कर ही क्या सकती है दुनिया और तुझ को देख कर
देखती जाएगी और हैरान होती जाएगी

काकुल-ए-ख़मदार में ख़म और आते जाएँगे
ज़ुल्फ़ उस की और भी शैतान होती जाएगी

आते आते इश्क़ करने का हुनर आ जाएगा
रफ़्ता-रफ़्ता ज़िंदगी आसान होती जाएगी

जा चुकीं ख़ुशियाँ तो अब ग़म हिजरतें करने लगे
दिल की बस्ती इस तरह वीरान होती जाएगी

— Ameer Imam

More by Ameer Imam

Other ghazal from the same pen

See all from Ameer Imam →

Mehboob Shayari

Shers of mehboob.

All Mehboob Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling