naqsh paani pe banaa ho jaise | नक़्श पानी पे बना हो जैसे

  - Ameer Qazalbash

नक़्श पानी पे बना हो जैसे
ज़िंदगी मौज-ए-बला हो जैसे

मुझ से बच बच के चली है दुनिया
मेरे नज़दीक ख़ुदा हो जैसे

कोई तहरीर मुकम्मल न हुई
मुझ से हर लफ़्ज़ ख़फ़ा हो जैसे

किस क़दर शहर में सन्नाटा है
अब के कोई न बचा हो जैसे

इस तरह पूज रही है दुनिया
कोई मुझ से भी बड़ा हो जैसे

राह मिलती है अंधेरों में मुझे
कोई मसरूफ़-ए-दुआ हो जैसे

मुझ को अक्सर ये हुआ है महसूस
कोई कुछ पूछ रहा हो जैसे

घर से इस तरह निकल आए 'अमीर'
कोई दुश्मन न रहा हो जैसे

  - Ameer Qazalbash

Nafrat Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Ameer Qazalbash

As you were reading Shayari by Ameer Qazalbash

Similar Writers

our suggestion based on Ameer Qazalbash

Similar Moods

As you were reading Nafrat Shayari Shayari