paai har ek raah-guzar par udaasiyaan | पाईं हर एक राह-गुज़र पर उदासियाँ

  - Ameer Qazalbash

पाईं हर एक राह-गुज़र पर उदासियाँ
निकली हुई हैं कब से सफ़र पर उदासियाँ

ख़्वाबीदा शहर जागने वाला है लौट आओ
बैठी हुई हैं शाम से घर पर उदासियाँ

मैं ख़ौफ़ से लरज़ता रहा पढ़ नहीं सका
फैली हुई थीं एक ख़बर पर उदासियाँ

सूरज के हाथ सब्ज़ क़बाओं तक आ गए
अब हैं यहाँ हर एक शजर पर उदासियाँ

अपने भी ख़त्त-ओ-ख़ाल निगाहों में अब नहीं
इस तरह छा गई हैं नज़र पर उदासियाँ

फैला रहा है कौन कभी सोचता हूँ मैं
ख़्वाबों के एक एक नगर पर उदासियाँ

सब लोग बन गए हैं अगर अजनबी तो क्या
छोड़ आएँगी मुझे मिरे दर पर उदासियाँ

  - Ameer Qazalbash

Kitaaben Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Ameer Qazalbash

As you were reading Shayari by Ameer Qazalbash

Similar Writers

our suggestion based on Ameer Qazalbash

Similar Moods

As you were reading Kitaaben Shayari Shayari