मन के मुंसिफ़ ने सज़ा दे के क़लम तोड़ दिया
और फिर ख़्वाहिशों ने सूली पे दम तोड़ दिया
फिर किसी फूल ने काँटों को हराया रण में
फिर किसी राम ने रावण का भरम तोड़ दिया
जब तलक अक़्ल न आई करी पूजा उस की
और फिर हम ने वो पत्थर का सनम तोड़ दिया
— Amit Jha Rahi
और फिर ख़्वाहिशों ने सूली पे दम तोड़ दिया
फिर किसी फूल ने काँटों को हराया रण में
फिर किसी राम ने रावण का भरम तोड़ दिया
जब तलक अक़्ल न आई करी पूजा उस की
और फिर हम ने वो पत्थर का सनम तोड़ दिया
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