अपने अंजाम की ज़रूरत है
इल्म को काम की ज़रूरत है
थक गए हैं परिंद उड़ते हुए
अब इन्हें शाम की ज़रूरत है
फिर अहिल्या हुई है पत्थर की
फिर किसी राम की ज़रूरत है
वो जो कहता था "नाम में क्या है"
उस को भी नाम की ज़रूरत है
लब की ख़्वाहिश है उस के लब चू
में
जाम को जाम की ज़रूरत है
— Amit Jha Rahi















