jab kabhi gham ne sataaya der tak | जब कभी ग़म ने सताया देर तक

  - Daqiiq Jabaali

जब कभी ग़म ने सताया देर तक
मैंने फिर ग़ज़लों को गाया देर तक

यार से अपने मैं जब जब भी मिला
सीने से उस को लगाया देर तक

हार कर भी जब मैं यारों हँस पड़ा
दुश्मनों ने ग़म मनाया देर तक

खौफ़ से दुनिया के मैं जब भी डरा
हौसला माँ ने बढ़ाया देर तक

झूठ कितना भी कहा उसने मगर
सच तो लेकिन छुप न पाया देर तक

हाथ ख़ुशियों ने कभी पकड़ा नहीं
साथ तो ग़म ने निभाया देर तक

माफ़ तुझको मैं भला कैसे करुँ
तूँ ने भी तो दिल दुखाया देर तक

शायरी ने जिस किसी को भी चुना
नौकरी वो कर न पाया देर तक

  - Daqiiq Jabaali

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