जब कभी ग़म ने सताया देर तक
मैंने फिर ग़ज़लों को गाया देर तक
यार से अपने मैं जब जब भी मिला
सीने से उस को लगाया देर तक
हार कर भी जब मैं यारों हँस पड़ा
दुश्मनों ने ग़म मनाया देर तक
खौफ़ से दुनिया के मैं जब भी डरा
हौसला माँ ने बढ़ाया देर तक
झूठ कितना भी कहा उसने मगर
सच तो लेकिन छुप न पाया देर तक
हाथ ख़ुशियों ने कभी पकड़ा नहीं
साथ तो ग़म ने निभाया देर तक
माफ़ तुझको मैं भला कैसे करुँ
तूँ ने भी तो दिल दुखाया देर तक
शायरी ने जिस किसी को भी चुना
नौकरी वो कर न पाया देर तक
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