टूट जाता है सिलसिला कैसा
उस का मुझ से है राबता कैसा
अब कहाँ फ़िक्र किस को दुनिया में
शक़्ल है कैसी आईना कैसा
है इधर हिज्र और उधर है वस्ल
हो गया मुझ पे हादसा कैसा
ऐश ही ऐश है तुम्हारी अब
जब नहीं मैं तो मसअला कैसा
जिस की मंज़िल नहीं हो तुम जानाँ
रास्ता है वो रास्ता कैसा
इतनी ख़ामोशी इतनी वीरानी?
कौन बतलाए शोर था कैसा
तुम को मेहनत से वास्ता ही नहीं
अपनी क़िस्मत से आसरा कैसा
देखो सिंदूर माँग में मेरी
मैं ने रक्खा है आसरा कैसा
दर्द जब शे'र में नहीं आए
क्या रदीफ़ इस की क़ाफ़िया कैसा
लोग खोये हुए हैं सेहरा में
ये ज़माना भी हो गया कैसा
एक क़श्ती और आग का दरिया
रात देखा जो ख़्वाब था कैसा
शा'इरी का सुरूर छाया रहा
दिन भी गुज़रा है आज का कैसा
तुम वहाँ, मैं यहाँ वो और कहीँ
उफ़्फ़ ये आख़िर है मामला कैसा
एक लम्हें में टूटे सारे क़सम
तुम ये तो कह दो साथ था कैसा
कोई आता है पर वो दिखता नहीं
साथ मेरे ये वसवसा कैसा
जब न लड़के का दायरा कुछ भी
एक लड़की का दायरा कैसा
मैं हूँ मासूम और सज़ा भी मुझे
तेरा मुंसिफ़ ये फ़ैसला कैसा
रूह से रूह का है रिश्ता जब
फिर शिकायत में फ़ासला कैसा
जान ले जाता है ये काफ़ी नहीं
ज़हर का यार ज़ाइक़ा कैसा
गुल नहीं तितलियां नहीं भँवरे नहीं
फिर ये मौसम भी ख़ुशनुमा कैसा
तुम 'अनन्या' न सब से दिल से मिलो
दे रहें लोग मशवरा कैसा















