मंज़िल कटी है पाँव की अपनी लकीर से
रिश्ता मिरा कटा है पुरानी नज़ीर से
शायद इसे भी ज़ब्त की आदत नहीं रही
नाराज़ है ये आँख भी अपनी बसीर से
वो जिस्म ढूँढ़ता है मिरे ख़्वाब बेच कर
टकरा रहा है ख़्वाहिशों का दुख ज़मीर से
अंधा बना के हाथ में कश्कोल रख दिया
धोखा मिला है मुल्क को अंधे सफ़ीर से
मिट्टी की प्यास ने मुझे मंज़िल दिखा दी है
लिपटी है ख़ाक आज मिरी इस हक़ीर से
आज़ाद कर सकेगी न ये मौत भी मुझे
बाँधा गया हूँ मैं तो किसी के असीर से
दुनिया समझ न पाएगी क़ीमत शिकस्त की
जीतेगा अपनी जंग ये 'अंचल' ही पीर से
— Anchal Maurya















