पहले लगा था हिज्र में जाएँगे जान से
पर जी रहे हैं और भी हम इत्मीनान से
दोनों को जोड़े इश्क़ की नाज़ुक सी डोर थी
अफ़सोस वो भी टूट गई खींच-तान से
फिर दरमियाँ बचेगा जो वो इश्क़ ही तो है
दुनिया अगर निकाल दें हम दरमियान से
इज़हार करते रहते हैं वैसे तो कितने लोग
अच्छा लगेगा पर मुझे तेरी ज़बान से
अव्वल तो क़ायदे से वहाँ हम ही आते दोस्त
उस ने मगर निकाल दिया इम्तिहान से
— Ankit Maurya















