नज़्म:-'शाहज़ादी'
बहुत नादान थी लड़की
मुझे अपना समझती थी
मुझी पे जाँ लुटाती थी
बहुत बातें बनाती थी
मुझे क़िस्से सुनाती थी
और उस
में शाहज़ादी थी
जिसे इक शाहज़ादे से मोहब्बत थी.!
वो कहती थी,
कि मैं भी शाहज़ादी हूँ
मुझे भी शाहज़ादा ही मिलेगा ना.!
जो मुझ पे जाँ लुटाएगा
मुझे अपना बनाएगा..
मैं कहता था,
कि मैं हूँ आम सा लड़का
मोहब्बत का तो मतलब भी मुझे अब तक नहीं मालूम.!
तुम्हें देखूं तो लगता है,
मोहब्बत चीज़ है कोई,जो तुम जैसी हसीं होंगी..
मैं तुम से बात करता हूँ तो लगता है,
मोहब्बत है कोई लड़की जो यूँ ही बोलती होगी..
तुम्हारे साथ होता हूँ तो लगता है,
मोहब्बत है यहीं पे पास में मेरे..
सो यूँ समझो,
मेरी ख़ातिर मोहब्बत तुम.
मोहब्बत का हो मतलब तुम.
वो कहती थी,
चलो झूठे बहुत बातें बनाते हो
नहीं हो इतने भोले तुम मुझे जितना दिखाते हो
कहा मैं ने,
अरे पगली मुझे छोड़ो चलो जाओ
कहीं से ढूंढ़ के लाओ
है कोई शाहज़ादा तो
कि तुम तो शाहज़ादी हो
तुम्हें तो शाहज़ादा ही मिलेगा ना.!
दिखा आँखें कहा उस ने कि हाँ हाँ ले ही आऊंगी
तुम्हें मैं फिर दिखाऊंगी.
दिखाया तो नहीं लेकिन
वो ख़ुद में खो गई शायद
या कोई मिल गया उस को
वो अब बातें बनाना भूल जाती थी
मुझे क़िस्से सुनाना भूल जाती थी
फिर इक दिन फोन कर बोली
कहा था ना,
कि मैं तो शाहज़ादी हूँ.!
तो देखो ढूंढ़ लाई मैं
तुम्हारे ही तरह बातें नहीं बिल्कुल बनाता है
मुझे वो शाहज़ादी ही बुलाता है
मुझे अपना बताता है
बहुत पैसे कमाता है
वो कहता है उसे मुझ से मोहब्बत है
जो मैं ने बोलना चाहा, कहा उस ने
कि रहने दो,ये बातें तुम न समझोगे
कि तुम हो आम से लड़के,
सो तुम से दूर जाना है
उसे अपना बनाना है
मुझे घर भी बसाना है..
मैं उस को अलविदा कहता
दुआ भी दे ही देता ना.!
बहुत जल्दी में थी शायद
सो उस ने कुछ भी सुनना ठीक ना समझा,
बिना बोले ही उस का फोन कट गया शायद...!!
बहुत नादान थी लड़की__....















