अभी हम सेे रूठे अभी वो ख़फ़ा है
ज़बाँ से वो अपनी नहीं बे-वफ़ा है
हमारे तो जीने का ये फ़लसफ़ा है
न कोई ख़सारा न कोई नफ़ा है
तुम्हीं याद आना न आना तुम्हारा
मोहब्बत है या फिर ये कोई जफ़ा है
फ़ना हो चुके हैं मुहब्बत में हम तो
ये लाशों का सौदा ही अबकी दफ़ा है
बुरा हो भला हो तुम्हें सोचते हैं
कि इस से बड़ी भी कहीं कुछ वफ़ा है
— anupam shah















