न चाँद है न रौशनी बड़ी अजीब रात है

चराग़ गुल मक़ाम गुल ये तीरगी हयात है

न ज़िक्र है न फ़िक्र है न गुफ़्तगू में लुत्फ़ अब
फ़क़त जुनूँ की आहटें न शह कहीं न मात है

न इश्क़ में यक़ीन है न वस्ल का ग़ुरूर है
मगर ये मोड़-मोड़ पर ज़ुनात की बिसात है

न बे-ज़मीं का ग़म रहा न आसमाँ से वास्ता
डरे इसी ख़याल से बड़ी अजीब बात है

न आरज़ू में रौशनी न इश्क़ में नज़ाकतें
उसी तरफ़ बढ़ा है क्यूँ ये कौन सी बरात है

न रहगुज़र में फूल है न साए में सुकून है
सफ़र फ़रेब कर रहा डगर भी वाहियात है

न हर्फ़ है न लफ़्ज़ है न दर्द की सदा कहीं
मलाल चीखता नहीं ये किस की काइनात है

न आइने में गर्द है न सूरतों में खोट है
कि नूर भी दिखा नहीं कहाँ पे सालिहात है

— arjun chamoli

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