तुम्हारे साथ ये क़िस्सा कभी कभार का है
मगर ये हिज्र मिरे साथ बार-बार का है
हमारे दरमियाँ इक शक की फ़िल्म है जिस में
कहीं कहीं पे कोई सीन ए'तिबार का है
ये तेरी हम पे इनायत है या चमन में किसी
ख़िज़ाँ-नसीब के हिस्से में सुख बहार का है
अगर तू ख़ुद को खुला छोड़ता है जान-ए-बहार
तो तुझ पे हक़ तिरे पहले उमीद-वार का है
ये तेरा जिस्म है या रहगुज़ार-ए-गुल है कोई
क़बा का बंद है या पेड़ रेगज़ार का है
मैं दिल के बारे में इतना ही जान पाया हूँ
कभी ये एक का होता था अब हज़ार का है
— Ashu Mishra















