दिल से मलब-ए-इश्क़ हटा यारों कुछ याद बनानी है
एक इमारत मुझ को हिज्र की उसके बाद बनानी है
क्यूँ रोका है बाँध बना कर दरिया की बातें समझो
बहने दो ये अश्क अभी आँखें नाशाद बनानी है
सागर से अब चारागर तू ऐसी इक तरतीब बना
तूफ़ानों को कश्ती में ला ज़ीस्त आबाद बनानी है
नंगे पाँव उसे तू भागे क़ैद क़फ़स में करने फिर
इक तस्वीर कबूतर की ऐसी सय्याद बनानी है
उसकी आँख मुसव्विर ख़्वाबों से भरनी है और सुनो
उसकी ये ज़ुल्फ़ें सब रंगो से आज़ाद बनानी है
देख अभी खून-सिंचाई करनी है उन के खेतों की
और अभी तो जिस्म गला कर सय्यद खाद बनानी है
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Aves Sayyad
our suggestion based on Aves Sayyad
As you were reading Baaten Shayari Shayari