"नाकामी"

नाकामी में घिरा हुआ देखो 'रंजन'
अपना कोई मुझ को आज न लगता है

ज़िम्मेदारी मुझ पर देखो भारी है
चुप ही रहना मेरी तो लाचारी है

जो सोचा था आज भी उस से दूर हूँ मैं
वक़्त के हाथों हाँ 'रंजन' मजबूर हूँ मैं

जग हँसता है मुझ पर मुझ को फ़र्क नहीं
जो अपना है वो क्यूँ मुझ पर हँसता है

इधर उधर के लोग भी मुझ को क्या जाने
अपने बच्चों को हरदम वो कहता है

देखो लड़का उस से तुम तो दूर रहो
सफल नहीं जो वो क्या सफल बनाएगा

घर के पैसों पर ही देखो पलता है
देखो तो कैसे वो शान से चलता है

पापा की पूँजी में आग लगाता है
दिल्ली में रह कर वो मौज उड़ाता है

बोलो 'रंजन' ऐसे को मैं क्या बोलूँ
हाँ सच है अब तक बिल्कुल नाकाम हूँ मैं

मंज़िल थोड़ी दूर सही लेकिन देखो
मरते दम तक मैं तो हार न मानूँगा

अभी तो दुख के सैलाबों को सहना है
जेब है ख़ाली मुझ को तन्हा रहना है

हाँ काली मेघा कि ये तो आहट है
मुझ को मंज़िल बस तेरी इक चाहत है

नाकामी की चादर भी हट जाएगी
आख़िर क़िस्मत कब तक मुझे रुलाएगी

बस कुछ दिन में बादल ये छँट जाएगा
'रंजन' यक़ीं है मेरा दिन भी आएगा

— ABHISHEK RANJAN

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