फिर दिसंबर की फ़ज़ा हो शाम हो
हाथ हाथों में तेरा हो शाम हो
हों मेरी क़िस्मत में ऐसे लम्हे भी
मुझ से तू लिपटा हुआ हो शाम हो
ऐ ख़ुदा मुझ को वो लम्हे से बचा
अलविदा उस ने कहा हो शाम हो
याद में तुम हाथ में जाम ओ क़दाह
बह रही ठंडी हवा हो शाम हो
क़ाफ़िला 'जस्सर' तुम्हारी याद का
सहन ए दिल में आ रुका हो शाम हो
— Avtar Singh Jasser















