waan rasai nahin to phir kya hai | वाँ रसाई नहीं तो फिर क्या है

  - Bahadur Shah Zafar

वाँ रसाई नहीं तो फिर क्या है
ये जुदाई नहीं तो फिर क्या है

हो मुलाक़ात तो सफ़ाई से
और सफ़ाई नहीं तो फिर क्या है

दिलरुबा को है दिलरुबाई शर्त
दिलरुबाई नहीं तो फिर क्या है

गिला होता है आश्नाई में
आश्नाई नहीं तो फिर क्या है

अल्लाह अल्लाह रे उन बुतों का ग़ुरूर
ये ख़ुदाई नहीं तो फिर क्या है

मौत आई तो टल नहीं सकती
और आई नहीं तो फिर क्या है

मगस-ए-क़ाब अग़निया होना है
बे-हयाई नहीं तो फिर क्या है

बोसा-ए-लब दिल-ए-शिकस्ता को
मोम्याई नहीं तो फिर क्या है

नहीं रोने में गर 'ज़फ़र' तासीर
जग-हँसाई नहीं तो फिर क्या है

  - Bahadur Shah Zafar

Dosti Shayari

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