चराग़ दिल में मुहब्बत का ख़ुद ही जलता है
कमाल का कोई एहसास है जो यकता है
ख़याल में ये तसव्वुर है तेरा महका सा
कहाँ पे गुल ये खिला है कहाँ महकता है
तेरा मिज़ाज तो अनपढ़ के हाथ का है ख़त
नज़र तो आता है मतलब कहाँ निकलता है
बनी हुई है ज़बाँ जो उदास आँखों की
वो अश्क़ सब्र के पहलू से कब निकलता है
भटक रहा हूँ मैं दुश्वारियों के जंगल में
यहीं कहीं से मेरा रास्ता निकलता है
फड़कने लगती है क्यूँँ बाज़ुएँ हवाओं की
चराग़ जब भी मेरे हौसले का जलता है
किसी के हिस्से में आई है धूप की दौलत
कोई है जो कि उजाले को भी तरसता है
वहाँ भी ख़ौफ़-ए-ख़िज़ाँ है बहार पर तारी
कहाँ चमन में भी रह कर सुकून मिलता है
मैं अपने गाँव में जिस घर को छोड़ आया था
वो ख़स्ता-हाल 'बशर' अब भी याद करता है
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