charaagh dil men muhabbat ka KHud hi jalta hai | चराग़ दिल में मुहब्बत का ख़ुद ही जलता है

  - Dharmesh bashar

चराग़ दिल में मुहब्बत का ख़ुद ही जलता है
कमाल का कोई एहसास है जो यकता है

ख़याल में ये तसव्वुर है तेरा महका सा
कहाँ पे गुल ये खिला है कहाँ महकता है

तेरा मिज़ाज तो अनपढ़ के हाथ का है ख़त
नज़र तो आता है मतलब कहाँ निकलता है

बनी हुई है ज़बाँ जो उदास आँखों की
वो अश्क़ सब्र के पहलू से कब निकलता है

भटक रहा हूँ मैं दुश्वारियों के जंगल में
यहीं कहीं से मेरा रास्ता निकलता है

फड़कने लगती है क्यूँँ बाज़ुएँ हवाओं की
चराग़ जब भी मेरे हौसले का जलता है

किसी के हिस्से में आई है धूप की दौलत
कोई है जो कि उजाले को भी तरसता है

वहाँ भी ख़ौफ़-ए-ख़िज़ाँ है बहार पर तारी
कहाँ चमन में भी रह कर सुकून मिलता है

मैं अपने गाँव में जिस घर को छोड़ आया था
वो ख़स्ता-हाल 'बशर' अब भी याद करता है

  - Dharmesh bashar

Bekhayali Shayari

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