ज़ीस्त अपनी इक दर्द-ए-पैहम है ग़म है
दर्द ही अपना अब तो हम दम है ग़म है
पंछियों को दे बाग़बाँ कुछ रिआ'यत
क़ैद में उनका टूटता दम है ग़म है
वुसअत-ए-सहरा जिसके आगे हुई है
उसकी चाहत भी अब मुझे कम है ग़म है
दश्त जैसी वीरानी थी आँखों में सुब्ह
और सर-ए-शब ये आँखें जो नम है ग़म है
की 'बशर' हाल-ए-ज़ार की उसने पुर्सिश
फिर मुझे बतलाना पड़ा ग़म है ग़म है
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