maan mausam ka kaha chhaai ghatta jaam utha | मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा

  - Bashir Badr

मान मौसम का कहा छाई घटा जाम उठा
आग से आग बुझा फूल खिला जाम उठा

पी मिरे यार तुझे अपनी क़सम देता हूँ
भूल जा शिकवा गिला हाथ मिला जाम उठा

हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका
सब बदल जाएगा क़िस्मत का लिखा जाम उठा

एक पल भी कभी हो जाता है सदियों जैसा
देर क्या करना यहाँ हाथ बढ़ा जाम उठा

प्यार ही प्यार है सब लोग बराबर हैं यहाँ
मय-कदे में कोई छोटा न बड़ा जाम उठा

  - Bashir Badr

Basant Shayari

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As you were reading Shayari by Bashir Badr

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    Bashir Badr
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    वो ग़ज़ल वालों का उस्लूब समझते होंगे
    चाँद कहते हैं किसे ख़ूब समझते होंगे

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    लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे

    मैं समझता था मोहब्बत की ज़बाँ ख़ुशबू है
    फूल से लोग उसे ख़ूब समझते होंगे

    देख कर फूल के औराक़ पे शबनम कुछ लोग
    तिरा अश्कों भरा मक्तूब समझते होंगे

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    आज के प्यार को मायूब समझते होंगे
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    Bashir Badr
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    अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया
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    काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के
    दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया

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    लेकिन ज़मीं से चाँद बहुत दूर हो गया

    तन्हाइयों ने तोड़ दी हम दोनों की अना!
    आईना बात करने पे मजबूर हो गया

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    जो बादशाह इश्क़ में मज़दूर हो गया

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    जिस दिन मिरा मुतालबा मंज़ूर हो गया
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    Bashir Badr
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    वो बोलता है तो इक रौशनी सी होती है
    Bashir Badr
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    तमाम मुल्क में वो सब से ख़ूबसूरत है

    कभी कभी कोई इंसान ऐसा लगता है
    पुराने शहर में जैसे नई इमारत है

    जमी है देर से कमरे में ग़ीबतों की नशिस्त
    फ़ज़ा में गर्द है माहौल में कुदूरत है

    बहुत दिनों से मिरे साथ थी मगर कल शाम
    मुझे पता चला वो कितनी ख़ूबसूरत है

    ये ज़ाइरान-ए-अली-गढ़ का ख़ास तोहफ़ा है
    मिरी ग़ज़ल का तबर्रुक दिलों की बरकत है
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