mere seene par vo sar rakhe hue sota raha | मेरे सीने पर वो सर रक्खे हुए सोता रहा

  - Bashir Badr

मेरे सीने पर वो सर रक्खे हुए सोता रहा
जाने क्या थी बात मैं जागा किया रोता रहा

शबनमी में धूप की जैसे वतन का ख़्वाब था
लोग ये समझे मैं सब्ज़े पर पड़ा सोता रहा

वादियों में गाह उतरा और कभी पर्बत चढ़ा
बोझ सा इक दिल पे रक्खा है जिसे ढोता रहा

गाह पानी गाह शबनम और कभी ख़ूनाब से
एक ही था दाग़ सीने में जिसे धोता रहा

इक हवा-ए-बे-तकाँ से आख़िरश मुरझा गया
ज़िंदगी भर जो मोहब्बत के शजर बोता रहा

रोने वालों ने उठा रक्खा था घर सर पर मगर
उम्र भर का जागने वाला पड़ा सोता रहा

रात की पलकों पे तारों की तरह जागा किया
सुब्ह की आँखों में शबनम की तरह रोता रहा

रौशनी को रंग कर के ले गए जिस रात लोग
कोई साया मेरे कमरे में छुपा रोता रहा

  - Bashir Badr

Diversity Shayari

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