उदासी का ये पत्थर आँसुओं से नम नहीं होता
हज़ारों जुगनुओं से भी अँधेरा कम नहीं होता
कभी बरसात में शादाब बेलें सूख जाती हैं
हरे पेड़ों के गिरने का कोई मौसम नहीं होता
बहुत से लोग दिल को इस तरह महफ़ूज़ रखते हैं
कोई बारिश हो ये काग़ज़ ज़रा भी नम नहीं होता
बिछड़ते वक़्त कोई बद-गुमानी दिल में आ जाती
उसे भी ग़म नहीं होता मुझे भी ग़म नहीं होता
ये आँसू हैं इन्हें फूलों में शबनम की तरह रखना
ग़ज़ल एहसास है एहसास का मातम नहीं होता
— Bashir Badr















