चाय
लम्हा लम्हा सोते जागते सवार रहता है
ज़ेहन-ओ-दिल में रोज़-ओ-शब बस इक ख़ुमार रहता है
हर हवस से इश्क़ से जुनून से ज़ियादा है
कुछ मेरी रगों में मेरे ख़ून से ज़ियादा है
इस क़दर मैं मुंतज़िर हूँ उस की एक दीद का
गोया रोज़ करता हूँ मैं इंतिज़ार ईद का
दर्द-ओ-ग़म को उस से कोई एतिराज़ भी नहीं
दुनिया में तो उस के जैसा चारासाज़ भी नहीं
साथ उसी का है बदलते मौसमों की फ़िक्र में
नाम उसी का लेता हूँ मेरे सुकूँ के ज़िक्र में
ज़िंदा रह तो सकता हूँ मैं आब-ओ-दाना छोड़कर
जी नहीं सकूँगा पर मैं उस से रिश्ता तोड़कर
उस का रूप सीना चीर के दिखा भी सकता हूँ
कोसों दूर चाय के लिए मैं जा भी सकता हूँ















