अब ये गुल गुलनार कब है ख़ार है बे-कार है

आप ने जब कह दिया बे-कार है बे-कार है

छोड़ कर मतला ग़ज़ल दमदार है बे-कार है
जब सिपह-सालार ही बीमार है बे-कार है

इक सवाल ऐसा है मेरे पास जिस के सामने
ये जो तेरी शिद्दत-ए-इंकार है बे-कार है

तुझ को भी है चाँद का दीदार करने की तलब
इक दिए को रौशनी दरकार है बे-कार है

मय-कदे के मुख़्तलिफ़ आदाब होते हैं 'चराग़'
जो यहाँ पर साहब-ए-किरदार है बे-कार है

— Charagh Sharma

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