किसी को क्लास से बाहर निकाल रक्खा है
किसी ने सीट पे रुमाल डाल रक्खा है
किसी ने कमरे में बर्बाद कर लिया ख़ुद को
किसी ने जंग में अपना ख़याल रक्खा है
हकीम-ए-शहर के बच्चों को पालने के लिए
हर आदमी ने कोई रोग पाल रक्खा है
वहाँ वो चिड़िया भी ख़ुश है ये सोच कर सय्याद
कि उस ने दुनिया को पिंजरे में डाल रक्खा है
ग़ज़ल ही इश्क़ का मैदान है तो आगे बढ़ो
यहाँ का मोर्चा हम ने सँभाल रक्खा है
— Charagh Sharma















