"बंजारा"
मैं हूँ बस एक बंजारा
कभी इस दिल कभी उस दिल
कभी ख़ामिल कभी शामिल
कभी पुर-दिल कभी बुजदिल
कभी कजदिल कभी ख़ुशदिल
कभी दिलबर कभी क़ातिल
कभी ग़ाफ़िल कभी यकतिल
कभी सागर कभी साहिल
ग़ुबार-ए-दिल फ़राग़-ए-दिल
ये राज़-ए-दिल वो ख़ून-ए-दिल
मेरा वो इश्क़ दाग़-ए-दिल
है दूद-ए-दिल मज़ाक़-ए-दिल
वो इक सूरत मुराद ए दिल
नहीं है इश्क़ बे-हासिल
मैं गिल-दर-गिल मैं नाक़ाबिल
सर-ए-महफ़िल बजाए दिल
कहीं भी जा रहा हूँ बस
नहीं मालूम मुझ को क्यूँ
मैं बंजारा ही तो हूँ इक
कभी आँखों में हाथों में
ठिठुरती ठंडी रातों में
किसी दिन के उजाले में
कलेजे के किसी छाले
स बहते उस लहू में तो
किसी आरिज़ पे आई उन
गुलाबी सी लकीरों में
गुदाज़ ओ नर्म बाँहों में
फ़िराक़-ए-ग़म की आहों में
कसक जो है उसे गाता फिर
किसी बैतुल-ग़ज़ल से मैं
ख़ुशी के ग़म को लिखता और
कहानी को सुनाता मैं
किसी दिल दर पड़ा फिर इक
दफ़ा उस लड़की को आवाज़
लगा कर इंतिज़ार-ए-मौत
में पागल राह देखता या
तो मर जाऊँगा या फिर
मुझे वो दिख ही जाएगी
तेरे मरने पे वो 'त्यागी'
अगर तब भी नहीं आई
तो क्या कुछ भी नहीं मैं तो
मैं तो वैसे भी बंजारा
मैं मिल जाऊँगा गाता
हुआ रोता हुआ पागल
कभी इस दर कभी उस दर
कभी इस घर कभी उस घर
कभी तारों नजारों में
बहारों या अदाकारों
फ़लक के हतमी तह पर या
हथेली की लकीरों में
नहीं तो ख़ामोश तस्वीरों में
ग़ज़ल में नज़्म में आँसू
में महफ़िल और ख़ामोशी में
कहीं तो
कभी तो
मैं मिल जाऊँगा लेकिन
रहे ये याद बंजारे
हमेशा से न थे ऐसे
कभी ये भी किसी के दिल
में बसते थे हँसते थे
मगर इक बे-वफ़ाई ने
कलेजा ख़ैर छोड़ो भी
अधूरी नज़्म लिखना तो
मेरी आदत है
अधूरा छूटा इक उम्मीद
सी देता है मुझे
कभी आ कर
अधूरे को
मुकम्मल करने की
सो इस लिए छोड़ देता हूँ
अधूरा इस को भी
वही बंजारा तुम्हारा















