Chhayank Tyagi

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Chhayank Tyagi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Chhayank Tyagi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

जिस्म चख कर भी मज़ा आया नहीं ख़त वाला जब तब यक़ीं आया कि पहला इश्क़ पहला होता है — Chhayank Tyagi
दिल में अजब सी बेकली है साक़ी चल भर दे गिलास पूरा नहीं तो पौना चल आधा सवा इक घूँट प्लीज़ — Chhayank Tyagi
कोई मुझे भी तो कभी चाहेगा ऐसे जैसे मैं उस बे-वफ़ा को चाहता था चाहता हूँ और ख़ैर — Chhayank Tyagi
लिखने थे पर्यायवाची दो ख़ुशी के इत्तिफ़ाक़न लिख दिया मैं ने भी झूठी बे-वफ़ा और जाने क्या क्या — Chhayank Tyagi
मैं तुझ को छोड़ दूँ जब तब तो तू मान लेगी अब फूलों को मसलना आदत सी बन गई है — Chhayank Tyagi
जो तुम्हारी थी वो कोई और थी छायांक त्यागी उस का मातम कल था पगले आज तो शादी है मेरी — Chhayank Tyagi
क्या गुज़रती है हमपे तुम्हें उस सेे क्या तुम तो बस वक़्त पे घर नहीं आते हो — Chhayank Tyagi
सारी दुनिया की नज़र हैं उस पे त्यागी आए हाए और देखो उस की आँखें पढ़ रही है मेरा चेहरा — Chhayank Tyagi
ख़ुद-कुशी कर लो अब ख़ुद ख़ुशी कहती है एक ग़म ही मिरा मरने देता नहीं — Chhayank Tyagi
हर बार तू जो चाहे नहीं होगा समझ ले अब मुझ सेे या तो नौकरी होगी या मोहब्बत — Chhayank Tyagi
हमारी ये कहानी भी यक़ीनन इक ग़ज़ल है है मतला दोस्ती जिस का है मक़्ता ये मोहब्बत — Chhayank Tyagi
संग रह जाते थे पानी पे ही लिख के राम का नाम कृष्ण के छूने से यकसाँ बाँस बन जाते थे मुरली — Chhayank Tyagi
बा-वफ़ा वो है नहीं और बे-वफ़ा कह कैसे दूँ मैं तो मुनासिब था यही ख़ामोश हो जाऊँ सो चुप हूँ — Chhayank Tyagi
हैं भटकते हुए ये मुसाफ़िर तले पलकों के तुम न यूँँ रुसवा करना बता के निरे आँसू हैं — Chhayank Tyagi
मान कैसे लूँ ख़ुदा है दोस्त लेकिन हाँ अगर अब तुझ को तुझ सा हो मुनासिब तो यक़ीं आए भी मुझ को — Chhayank Tyagi
आदमी रोता है हिज्र में रात-दिन अच्छा जी औरतें अश्कों में चून तक माँडती है समझ — Chhayank Tyagi
उस को अच्छे लगते हैं गुल फूल काफ़ी इस लिए ही खेलती है वो दिलों से — Chhayank Tyagi
एक अपना है मिला हम अजनबी हों जैसे त्यागी जल रहा है क़ल्ब मेरे यार तू सिगरेट सुलगा — Chhayank Tyagi
इस कूचा-ए-नौ के हैं अफ़साने बहुत इस राह से गुज़रे हैं दीवाने बहुत — Chhayank Tyagi

Ghazal

जब किसी पे भी उस की बा-ख़ुदा नज़र जाए मेरे हाथों से इक दम इश्क़ दिल बिखर जाए क्यूँ न इश्क़ हो मुझ को क्यूँ न ख़्वाब देखूँ मैं एक शख़्स की ख़ातिर क्या ये बंदा मर जाए उस के बा'द से मैं भी बे-वफ़ा हूँ मेरे यार मेरे हिज्र में कोई मरता है तो मर जाए ये तो मेरी किस्मत है ये नहीं बदल सकती तेरी जुल्फ थोड़ी है यार जो सँवर जाए तुम न हाँ ही करती हो और न भी नहीं करती ऐसे में बताओ ना बंदा फिर किधर जाए शा'इरी जो है वो न लड़की जैसी होती है इस के साए में बैठे जो भी वो पसर जाए तेरे बिन तड़पता है बस बहुत हुआ छोड़ो वो तड़प उठे अब तो ऐसी कुछ ख़बर जाए मरने कैसे दें हाकिम हम तुम्हें मोहब्बत में ये मेरा मुकद्दर है कारवाँ गुज़र जाए — Chhayank Tyagi
सुनो दिल-जू ग़ज़ल वालों कभी मेरा भी कोई था किसी को छोड़ा भी था मैं ने सो बिछड़ा भी कोई था चराग़-ए-आख़िर-ए-शब के अलावा मुश्तमिल थे लोग सहर तक तेरी याद-ए-रफ़्ता में रोया भी कोई था वो जो सबका है उस सेे पूछना उस का भी कोई है है गर तो पूछना उस सेे कभी उस का भी कोई था तुम्हें लगता है बस तुम थे अरे बुद्धू तेरे बाहम दिनों चलता भी कोई था इशा जलता भी कोई था मोहब्बत की कहानी है बड़ी लंबी नए आशिक़ कभी मजनूँ भी कोई था कभी राँझा भी कोई था तुझे जाना है तो ऐ राहत-ए-जाँ चल जा दुनिया घूम मगर मुझ सेा न कोई है न ही मुझ सेा भी कोई था तुम्हें कुछ फ़र्क पड़ता है कभी छोड़ो भी जाने दो गिला भी कोई है वरना कभी शिकवा भी कोई था बडे़ नाराज़ हो मुझ सेे जो ख़ुद-सोज़ी न करता तो मैं क्या करता सिवा इस के बता रस्ता भी कोई था यक़ीनन छूट जाते हैं पुराने सब सफ़र में यार किसे मक़ते पे आता है कभी मतला भी कोई था — Chhayank Tyagi
उस के जितना तो कभी अच्छा नहीं था मेरे चेहरे पे कोई चेहरा नहीं था बे नसीबी है नहीं मेरी तो क्या है खोया है वो जो अभी पाया नहीं था उस तरफ़ वो सब को छाती से लगाती इस तरफ़ मैं ने कोई देखा नहीं था उस के बिन ही जी रहा हूँ मैं अभी तक जिस के बिन मुझ को कभी मरना नहीं था तुम अगर मुझ सेे निभा लेती मोहब्बत इतना घाटे का तो ये सौदा नहीं था जब किसी ने ओ ख़ुशी कह के पुकारा एक पल को मेरा दिल धड़का नहीं था बिन ख़ता भी मैं ने तो खाई है गाली बद-मआशी का मेरा सपना नहीं था राम से क्यूँ हारा लंका का वो रावण उस की जानिब उस का इक भैया नहीं था ज़िंदगी जिस के लिए मैं ने की ग़ारत वो मगर मुझ सेे कभी बिछड़ा नहीं था उस के मेरे हाल भी इक से थे क़िस्मत उस पे मतला तो था पर मक़्ता नहीं था उस का मैं हो के रहा सारा ही ता-उम्र मेरा जो त्यागी कभी आधा नहीं था — Chhayank Tyagi
आज कल तो ये हुनर भी आना चाहिए लत लगा के अपनी छोड़ जाना चाहिए उस ने तो तुझे भुला दिया है कब का बस अब तुझे भी उस को भूल जाना चाहिए ज़िंदगी तो जाती है निभाने में वफ़ा छोड़ने का क्या है बस बहाना चाहिए उस की बेवफ़ाई पे ही सिर्फ़ क्यूँँ लिखो उस की आँखों पे भी शे'र होना चाहिए इस शनावरी पे नाज़ भी अहम है पर ऐसी आँखों में तो डूब जाना चाहिए हर दफ़ा ये क्या कि तुम ही रूठो इश्क़ में अब तुम्हें भी तो कभी मनाना चाहिए एक शख़्स रटने में लगे हैं साल दो अब उसे भुलाने को ज़माना चाहिए उम्र भर के मुंतज़िर को कुछ नहीं मिला शाइरों को बे-वफ़ा ही होना चाहिए — Chhayank Tyagi
कल रस्ते में दो अजनबी हम से थे और मैं रो पड़ा बस याद आए कुछ पुराने लम्हे और मैं रो पड़ा उस ने मेरे दिल के करे सो टुकड़े पर मैं चुप रहा फिर टूटे इक इक कर के दिल के टुकड़े और मैं रो पड़ा मैं समझा था अब वो मेरा दिल छोड़ के जा ही चुकी अलमारी से कुछ ख़त पुराने निकले और मैं रो पड़ा इक छोटी बच्ची की विदाई ने मुझे पत्थर करा इक शाहज़ादी के न बिछवे निकले और मैं रो पड़ा जाने मुझे क्या याद आया एक दम अल्लाह उफ़ उस फ़िल्म में बस लड़का लड़की बिछड़े और मैं रो पड़ा पापा मेरे चीख़ें मेरी बेटी गई मैं बोला उन हाथों से उस के बस ये बाज़ू छूटे और मैं रो पड़ा — Chhayank Tyagi
हयात भर करे वो इंतिज़ार तो मैं मिलूॅं अगर वो सिर्फ़ करे मुझ सेे प्यार तो मैं मिलूॅं हसीन लड़कियों की इल्तिज़ा है एक तरफ़ मुझे वो इक दफ़ा बोले न यार तो मैं मिलूॅं दुआ में चुपके से मैं माँगने पे मिलता नहीं मैं इश्क़ हूँ तू ज़रा चीख़ मार तो मैं मिलूॅं या माँग ले तू ये मख़मल के ख़्वाब अब ख़ुदा से क़ुबूल गर तुझे इश्क़-ओ-असार तो मैं मिलूॅं शग़फ़ है भी या नहीं कैसे साफ़ होगा बता न मिलने आ सकूँ तो आँखें घार तो मैं मिलूॅं वो मेरा तिश्ना-ए-दीदार है तो सब है वही ख़याल में ही हो गर हुस्न-दार तो मैं मिलूॅं — Chhayank Tyagi
आँखों से हाल-ए-दिल बता के देखा है इक शख़्स को दुनिया बना के देखा है इक आख़िरी उम्मीद का दम टूटा बस दीवार से फोटो हटा के देखा है आँखों को होता है मुयस्सर पानी ही हम ने ये दिल विल सब लगा के देखा है ख़ुद ही के बातिन पे उभर छाले गए उन की तरह उन को सता के देखा है इक रोज़ जो भूले नहीं लेते ख़बर हूँ मुंतज़िर ख़ल्क़त भुला के देखा है ये झूट है हम चाँद छू सकते नहीं मैं ने बदन पे लब लगा के देखा है अधरों पे उन के नाम भी आया नहीं राहों में पलकें भी बिछा के देखा है तू ने अभी देखा ही क्या है देखा है रोते हुए सब को हँसा के देखा है त्यागी ये दुनिया पैसे से ही चलती है सच्ची ये भी पैसा कमा के देखा है — Chhayank Tyagi
उस के हाथों में जब थी इंतिक़ाम की मेहँदी मेरी आँखों में थी बस एहतिराम की मेहँदी दिल पे उभरी हैं यादें मानो रचती है जैसे राधिका के हाथों पर अपने श्याम की मेहँदी है नहीं लकीरों में उस के ज़िक्र भी मेरा जिस के हाथ पे थी कल मेरे नाम की मेहँदी दिल तो उस ने पहले ही दे दिया है मुझ को यार हाथों पे लगी है अब सिर्फ़ नाम की मेहँदी जिस के नाम कर दी है मैं ने ज़िंदगी अपनी उस के दिल में हाज़िर है इज़्दिहाम की मेहँदी मेरे ख़ून से उस ने हाथ हैं करे पीले कहने को लगी उस के ला'ल-फ़ाम की मेहँदी तोड़ना नहीं ये दिल है क़सम तुम्हें मेरी ख़ूनी होती है 'त्यागी' ख़ुर्द-ख़ाम की मेहँदी — Chhayank Tyagi
है निदा में सरकशी भी दिलकशी भी मयकशी भी और ग़ज़ल में बेकली ही बेकसी भी बेबसी सी तुम चलो उस का परी चेहरा मुलाइम जिस्म छोड़ो उस की आँखें देखी हैं होगी मोहब्बत लाज़िमी ही क्यूँ मेरे अपने हुए जाते हैं मुझ सेे दूर बोलो ऐसे में तो पूछ लेते हैं न हालत अजनबी भी जाने वाला तो कभी आया नहीं वापस मगर दोस्त मुंतज़िर ने मुंतज़र की राह देखी उम्र भर ही आज कल तो लड़कियों को चाहिए बस एक नौकर और नौकर भी वो जिस की हो लगी इक नौकरी भी एक लड़की को मिले दिल खेलने को तिफ़्ली से ही और लड़के को न मिल पाया था खाना पेट भर भी हैं नदी सागर शजर कितने तो है मख़्लूक़ अल्लाह दिल बता फिर भी हमें दुनिया लगी क्यूँ मुख़्तसर ही — Chhayank Tyagi
मैं हूँ आधा दुनिया और हूँ आधा पागल ऐसी बातें करता है पर पूरा पागल मेरा दिलबर इतना बुद्धू अहमक़ लेकिन जैसा भी है मुझ को प्यारा मेरा पागल बोले दुनिया है मुझ को मजनूँ और शाइ'र मेरे अंदर मिर्ज़ा पागल राँझा पागल दुनिया बोले नादानी है अल्हड़पन की ऐसा है तो मीरा पागल राधा पागल यूँँ फिरता हूँ जो दर दर हो के तन्हा मैं मेरे अंदर रहता है कोई तन्हा पागल कहने से कुछ भी मुझ को अब डर लगता है मेरे भीतर अंधा पागल बहरा पागल यार मिरे सारे ही यकसाँ बरखा पागल तारे पागल सूरज पागल चंदा पागल यार ज़रूरत थी जब कोई न आश्ना था जब आँसू ख़ुश्क हो गए तो सहरा पागल ख़ुद को समझे ख़ुश-क़िस्मत वो मुझ पागल से फिर तो है 'त्यागी' सल्तनत का राजा पागल — Chhayank Tyagi

Nazm

"गुज़िश्ता" पिछले कुछ बरस की यादें पिछली कुछ रातों से मेरे ज़ेहन में सर पटक रही हैं ये मेरी साँसें जो मेरी इक़तिज़ा-ए-वजूद हैं फिर भी मेरी आँखों को खटक रही हैं तेरी उन तंग गलियों और उन छतों पर धूल चढ़ी किताबों और उन खतों पर उस गुलज़ार-ए-रिज़वा के फूलों की उदास ख़ुशबू में पेड़ों की चुभती छाँव में शहर के कैफ़े में और मेरे उस छोटे से गाँव में तितलियों की ढलती रा'नाई में कोयलों की बुझती गिनाई में उन मजलूमों की रंजीदा एहतिमाम-ए-रा'नाई में तेरी हथेलियों पर लगी किसी और के नाम की हीनाई में तेरी चौखट पर तेरी खिड़की पे मेरी आँखों में तुम्हारी सिड़की ने मेरी तवक़्क़ो' को तोड़ दिया है तू ने मुझ को छोड़ दिया है मेरे आज़ुर्दा ख़्वाब बिखर चुके हैं भीतर ही भीतर मर चुके हैं बेहतर की तलाश में ख़ुशतर दिन गुज़र चुके हैं तेरे वस्ल में दुनिया को दर-गुज़र चुके हैं तेरी ग़ैर-मौजूदगी और ये मेरी बे-तकान अफ़ज़ाइश-ए-मोहब्बत तेरे लिए दम तोड़ती हुई उम्मीद-ए-दीदार तेरा सरकता हुआ इश्क़ और ये रक़ीब से क़रार-दाद-ए-इज़दिवाज सब मिल कर मुझे ख़ुद–कुशी के लिए तस्ख़ीर कर चुके हैं क्लास की उस बेंच पर डाइरी के पन्नों में ग़ज़ल-ओ-नज़्म के मानी में ख़ुश्क होंठों पर आँखों के पानी में जो याद-ए-गुज़िश्ता क़ैद थी अब मेरे भीतर भटक रही है वो एक बात जो कहनी है मेरे गले में अटक रही है क्या ये सच है तू भी उसे चाहने लगी है–झूठ कल तक तो तेरे पास मेरी माँ की कटक रही है और क्यूँ मेरी दी हुई लाकेट तेरे गले में लटक रही है मैं कैसे क्या ही कर लूँगा अगर तू ही हटक रही है पिछले कुछ बरस की यादें पिछली कुछ रातों से मेरे ज़ेहन में सर पटक रही हैं ये मेरी साँसें जो मेरी इक़तिज़ा-ए-वजूद हैं फिर भी मेरी आँखों को खटक रही हैं ये आख़िरी ख़त था जो मैं ने उसे भेजा था वो आख़िरी रात थी जब मैं ने उसे देखा था उस ने हर बार की तरह क़ाबिल-ए-तर्जीह नहीं समझा उस ने हर बार की तरह मेरे क़रीह को क़रीह नहीं समझा मैं तो पागल हूँ इश्क़ मेरा मौला तड़प मेरी तक़दीर हिज्र मेरा मुक़द्दर उदास शा में तन्हा रातें भीगी सुब्ह कसक ख़लिश टीस दिल की ज़रूरत समझी सो फ़रेब बे-वफ़ाई हरजाई-पन बद-'अहदी बक्शी शा'इरी भी की मैं ने तो उस ने उसे मदीह नहीं समझा मोहब्बत को ख़ुदा कहा मा'शूक़ को फ़क़ीह नहीं समझा काज़िबा को मसीह समझा उस की बाहों को बाम-ए-मसीह समझा उस ने हज्व-ए-मलीह की मेरे मलीह रंग पर नक़ीह थे तो नक़ीह समझा मुझे क़ाबिल-ए-तम्दीह नहीं समझा मैं ने हमेशा दस्त-गिरी की उस की जिस ने मुझे कभी नहीं समझा उस ने जितनी हो सकी बदनामी की इश्क़ में अना कुचली मैं ने कभी ख़ुद को फ़ज़ीह नहीं समझा पढ़ते पढ़ते ही लिखने का फ़न आ गया मैं ने कोई तरशीह नहीं समझा उस ने तेरे साथ क्या किया है–समझता है मोहब्बत शायद बे-वफ़ाई नहीं और सोच पता नहीं और तो या'नी तू नहीं समझा– जी कुछ नहीं समझा तू ने उसे क्या समझा– जी बहुत कुछ समझा उस ने तुझे क्या समझा– जी कुछ नहीं समझा अब तो समझे– जी कुछ नहीं समझा ये सब कहा था मेरे यारों ने उस रात लगा था ये रात नहीं गुज़रेगी फिर वो रात गुज़र गई सारी ख़्वाब-ओ-ख़्वाहिश एक साथ बिखर गई वो बियाह कर के एक अफ़सर के साथ रोई तो मगर गई बे-वफ़ाई थी या वो मजबूर थी जो भी था मुझ सेे बिछड़ के उस के अंदर एक लड़की मर गई मुझ सेे कहती थी डरते क्यूँ हो मैं तेरे साथ हूँ फिर वक़्त आने पर वो लड़की ही डर गई उस सेे बिछड़ के मैं टूट गया वो बिखर गई लगा था अब साँसें जैसे रुक जाएँगी नहीं रुकी लगा था ये सरगम टूट जाएगी सो टूट गई दिल की धड़कन मगर नहीं रुकी लगा था ये दिन ये रात ये सुब्ह ये शाम ये बादल ये घटा ये सूरज ये चाँद ये तारे ये धूप ये छाँव ये हवा ये बारिश ये हँसी ख़ुशी चेहरे की ये चहल पहल लोगों की ये फूल महकते हुए ये चिड़िया चहकती हुई मेरा दिल है के ग़ज़ा ये मचलती हुई फ़ज़ा सब रुक जाएगा कुछ नहीं रुका लगा था एक आँधी एक तूफ़ान आएगा जो सब बहा ले जाएगा बादल फटेंगे बाँध टूटेगा पहाड़ तोड़ के पानी सारे शहर तबाह कर देगा जैसे उस ने मेरे दिल को किया है कुछ नहीं हुआ आँख से बस एक बूँद टपकी और दोस्त ने कहा वो तो जा चुकी कब की मुझे भी पता था जबकि ये बात थी तबकी जिस रात उस ने ये तअल्लुक़ तोड़ा था जिस रात उस ने ये शहर छोड़ा था उस बात को कई बरस बीत चुके हैं अब तो उस के बिना रहना भी सीख चुका हूँ उस की याद में उस के इंतिज़ार में काफ़ी कुछ लिख चुका हूँ उस सेे कहना मगर फिर भी आज भी मैं रातों में जगता हूँ चुपके चुपके सारी ख़बर रखता हूँ खाने से पहले उस का निवाला रखता हूँ तन्हा बैठ के ही सही रात को चाँद तकता हूँ वो तो आज भी मेरी या अमर है पूछना था अब मैं उस का क्या लगता हूँ मैं तो उस की यादों में जीता हूँ उस पे मरता हूँ और सच कहने से भी नहीं डरता हूँ उस सेे इश्क़ करता था और अब भी उसी से करता हूँ पता नहीं अब उस के दिल में क्या है मेरे लिए मैं तो मगर मर मिटा हूँ उस के लिए उस सेे कहना था उस सेे पूछना था पूछना था तुझे याद भी है तू मुझे याद करती थी हम दोनों कभी 'उश्शाक़ थे तू ख़ामोश बैठी रह बेशक मगर दुनिया तो आज भी तेरा नाम मेरे साथ लेती है तू ने क्यूँ नहीं दिया लड़कियाँ तो साथ देती हैं ख़ैर रोज़ ऐसे नए सवाल ज़ेहन में आते रहते हैं मेरे यार और मैं रोज़ ख़ुद तेरे हिमायती बनके मेरे दिल को समझाते रहते हैं बताते रहते हैं बिछड़ने वाले में सब कुछ था बे-वफ़ाई न थी मगर थी ये तो बस हम दोनों जानते हैं बस यही सब सोचता रहता हूँ ख़ुद के नाख़ूनों से इन ज़ख़्मों को नोचता रहता हूँ तेरे साथ बिताए हर एक लम्हे में गुम हूँ मैं अब मैं नहीं हूँ अब मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम हूँ अपने माज़ी की दीवार के मलबे में दबा पड़ा हूँ तू कभी आएगी तो पाएगी मैं कब का मरा पड़ा हूँ सोचता रहता हूँ हम लोग हर पल तन्हा क्यूँ होते हैं हर पल शोरीदा क़िस्मत पर क्यूँ रोते हैं बस एक दहलीज़ पर ही क्यूँ सोते हैं अपना आपा क्यूँ खोते हैं हम शाइ'र ऐसे क्यूँ होते हैं एक बात बताओ तू मुझे मिली भी और तू मिली भी नहीं फूल खिले भी और खिले भी नहीं तू आई तो मेरे ज़ख़्म सिले मगर सिले भी नहीं पहली मोहब्बत कोई और थी मगर तुझे चाहा उस सेे ज़ियादा था सो तेरे बिछड़ने का ग़म जानाँ पहली वालियों से भी ज़ियादा था मेरा तुझ सेे इश्क़ नहीं शादी का इरादा था मैं ने तो पीपल पर धागा भी बाँधा था तू ने मगर बीच राह में ही हाथ छोड़ दिया– क्यूँ तू ने मेरा दिल तोड़ दिया– क्यूँ हबाब तेरी याद का फूटता नहीं सुना था घर का लाल टूटता नहीं लुटने वाले लुटते हैं कोई लूटता नहीं मरासिम टूट भी जाए उन्स छूटता नहीं हाथ छूट जाता है साथ छूट जाता है ख़्वाब टूट जाता है ख़्वाहिश छूट जाती है आदत छूट जाती है इबादत छूट जाती है दिल टूट जाता है तर्ज़ टूट जाती है 'इल्लत छूट ती नहीं तवक़्क़ो' टूट ती नहीं रब्त टूट जाता है रिश्ता टूटता नहीं गुज़िश्ता छूटता नहीं — Chhayank Tyagi
एक साल ओ मेरे दिल के टुकड़े मेरी बहना मेरी बेटी मेरे बच्चे आज एक साल हो गया तुम्हें बाशिंदा ए अदम-आबाद हुए मेरी छोटी-सी दुनिया को बर्बाद हुए जैसे ये ख़ुशबू धूप अब्र-ओ-बाद हुए तुम्हें आज़ाद हुए मुझे शब-ज़ाद हुए तुम सेे कोई विवाद हुए मुझे ना-मुराद हुए इस दिल को ना शाद हुए तुम्हें महज़ एक याद हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया मुक़द्दर को बिगड़े हुए मुझे तुम सेे बिछड़े हुए इस घर को उजड़े हुए इस दिल के टुकड़े हुए बैठा रहता हूँ मैं तेरी तस्वीर को पकड़े हुए बैठी है तेरी याद दिल में दिल को जकड़े हुए तेरे मेरे झगड़े हुए और मुझे तुझ पे अकड़े हुए अभागे बाप के मुखड़े से एक आँख को लिकड़े हुए अभागे भाई के कांधे से एक बाज़ू को उखड़े हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया ख़ुशियों को घर छोड़े हुए ख़ुदा को मुक़द्दर फोड़े हुए घर की तरफ़ सैलाब को मोड़े हुए मेरी नींद को छीने ख़्वाब को तोड़े हुए डाॅक्टर के पैरो में लौटे हुए हाथों को जोड़े हुए तुझ को ये दुनिया छोड़े हुए मुझे दुनिया से सब नाते तोड़े हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया घर में उदासी को छाए हुए इन होंटों पर हॅंसी को आए हुए पिताजी को क़िस्से सुनाए हुए बगिया में फूलों को आए हुए ऑंगन में सन्नाटा छाए हुए पीठ पर तेरा चाटा खाए हुए मुझ को गाना गाए हुए जी से कोई खाना खाए हुए दिल को पत्थर करे हुए याद में तेरी आँसू बहाए हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया मुझे कुछ लिखे हुए तुझे कहीं दिखे हुए मुझे चैन से सोए हुए तेरी याद में खोए हुए तेरी आवाज़ सुने हुए तेरे साथ तारों को गिने हुए तुझे मुझ सेे छीने हुए आज बारह महीने हुए ख़ुश रंग ख़्वाबों को किसी नज़र की आग में जले हुए हमारे आशियाँ के सूरज को ढले हुए जिन में मिस्मार हो गई झोपड़ी अपनी उन ऑंधियों को चले हुए इन आँखों और रुख़सारों को गिले हुए मुझे तुझ से मिले हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया भरने थे जो ज़ख़्म जिगर के वक़्त के साथ सिर्फ़ गहरे हुए हैं हम समुंदर में डूबी उस कश्ती की राह में आज भी किनारे पर ठहरे हुए हैं हर किसी ने शुरू में कहा था “ह में भी दर्द बस शुरू में रहा था” अभी यक़ीन नहीं होगा दिल भी ग़मगीन नहीं होगा एक वक़्त पर जा चुका है दिल मान जाता है एक वक़्त के बा'द हर दर्द दवा बन जाता है मगर न जाने क्यूँ ये दर्द तो बढ़ता जाता है मुझे सुकून नहीं मिल पाता है कैसी ज़ुल्मत बढ़ती जाती है मेरी हिम्मत टूटती जाती है जब लौट के तुम नहीं आती हो ये दीवाली क्यूँ आ जाती है मुझ को ये मालूम भी है लौट के नहीं कभी आते हैं अब तुम जिस जहाँ में रहती हो पर तुम कब जहाँ में रहती हो तुम तो आब ओ हवा में बहती हो ये तेरा भैया तेरे पापा तेरी मैया ये चंदा तारे जुगनू दीपक फूल ओ कलियाँ ये सूनी गलियाँ और हम सब तुझ को खोजते रहते हैं हम सब तुझ को सोचते रहते हैं सब सेे कहते रहते हैं यहीं है वो कहीं नहीं गई है वो मेरे दिल में रहती है वो मुझ सेे मिलती रहती है ख़्वाबों में वीरान दिल के उजड़े गुलशन में मेरे तन में मेरे मन में इस चमन में होली के रंगों में पिचकारी में गुब्बारों में दिवाली की फुलझड़ियो में चकरी में अनारों में रंगोली के रंगों में दिए में लड़ियों में खिड़की पर बैठी गिलहरी में चिड़ियों में नौ रातों की नौ देवियों में जिमती है पहले आरती करती थी अब कराती है मुझ को बेहद रुलाती है मुझे भैया कह के बुलाती है छत की कड़ी में दीवार की घड़ी में हर पल टक-टक करती है मेरे भीतर मेरे दिल के ऑंगन में खेल खेलती वो हर पल बक-बक करती है ठंडी रात के घोर सन्नाटे में वो मेरी ग़ज़लें गाती है आज खुल्द में क्या-क्या हुआ रात को आके बताती है मैं गले लगाने को उठता हूँ आँख खुलती है गुम हो जाती है ऐसा होते हुए मुझ को रोते हुए एक साल हो गया — Chhayank Tyagi
"बंजारा" मैं हूँ बस एक बंजारा कभी इस दिल कभी उस दिल कभी ख़ामिल कभी शामिल कभी पुर-दिल कभी बुजदिल कभी कजदिल कभी ख़ुशदिल कभी दिलबर कभी क़ातिल कभी ग़ाफ़िल कभी यकतिल कभी सागर कभी साहिल ग़ुबार-ए-दिल फ़राग़-ए-दिल ये राज़-ए-दिल वो ख़ून-ए-दिल मेरा वो इश्क़ दाग़-ए-दिल है दूद-ए-दिल मज़ाक़-ए-दिल वो इक सूरत मुराद ए दिल नहीं है इश्क़ बे-हासिल मैं गिल-दर-गिल मैं नाक़ाबिल सर-ए-महफ़िल बजाए दिल कहीं भी जा रहा हूँ बस नहीं मालूम मुझ को क्यूँ मैं बंजारा ही तो हूँ इक कभी आँखों में हाथों में ठिठुरती ठंडी रातों में किसी दिन के उजाले में कलेजे के किसी छाले स बहते उस लहू में तो किसी आरिज़ पे आई उन गुलाबी सी लकीरों में गुदाज़ ओ नर्म बाँहों में फ़िराक़-ए-ग़म की आहों में कसक जो है उसे गाता फिर किसी बैतुल-ग़ज़ल से मैं ख़ुशी के ग़म को लिखता और कहानी को सुनाता मैं किसी दिल दर पड़ा फिर इक दफ़ा उस लड़की को आवाज़ लगा कर इंतिज़ार-ए-मौत में पागल राह देखता या तो मर जाऊँगा या फिर मुझे वो दिख ही जाएगी तेरे मरने पे वो 'त्यागी' अगर तब भी नहीं आई तो क्या कुछ भी नहीं मैं तो मैं तो वैसे भी बंजारा मैं मिल जाऊँगा गाता हुआ रोता हुआ पागल कभी इस दर कभी उस दर कभी इस घर कभी उस घर कभी तारों नजारों में बहारों या अदाकारों फ़लक के हतमी तह पर या हथेली की लकीरों में नहीं तो ख़ामोश तस्वीरों में ग़ज़ल में नज़्म में आँसू में महफ़िल और ख़ामोशी में कहीं तो कभी तो मैं मिल जाऊँगा लेकिन रहे ये याद बंजारे हमेशा से न थे ऐसे कभी ये भी किसी के दिल में बसते थे हँसते थे मगर इक बे-वफ़ाई ने कलेजा ख़ैर छोड़ो भी अधूरी नज़्म लिखना तो मेरी आदत है अधूरा छूटा इक उम्मीद सी देता है मुझे कभी आ कर अधूरे को मुकम्मल करने की सो इस लिए छोड़ देता हूँ अधूरा इस को भी वही बंजारा तुम्हारा — Chhayank Tyagi
"उस सेे कहना" उस सेे कहना बिछड़ गए तो क्या याद तो अब भी आती है उस के लौट आने की उम्मीद अब भी नज़र आती है आधी रात को चाँद जब खिड़कियों से झाँकता है मैं कुछ भी लिखने बैठता हूँ मगर मेरा हाथ काँपता है पता नहीं क्यूँ एक कमी-सी रहती है ये निगाहें उस एक तस्वीर पर थमी-सी रहती है पुराने मैसेज में लबालब भरी मोहब्बत देख कर पिघल जाता है पत्थर वरना तो इस दिल पे बर्फ जमी-सी रहती है गुलज़ार से कहना जैसी उस की एक रात थी वैसी यहाँ हर रोज़ आँख में नमी-सी रहती है मेरी तन्हाई और उस की बे-ए'तिनाई मेरी अधूरी छूटी पड़ी ग़ज़लें और नज़्में वैसे कुछ हिज्र के मुकम्मल शे'र हैं बुझे पड़े दिए हैं जली हुई अँधेर है उस के नाम लिखे गए ख़त मेरे घर की वीरान पड़ी छत तस्वीर से उस की ठोड़ी का तिल और मेरा बिखरा हुआ दिल और वो याद है एक मुरझाया हुआ गुलाब था ना मेरा एक टूटा हुआ ख़्वाब है ना ये सभी रोज़ मेरे बगल में आ कर खड़े हो जाते हैं और मुझ सेे कहते हैं उस सेे कहना दिल टूट गया तो क्या अब भी धड़कता है एक शख़्स तेरे शहर की गलियों में भटकता है ये आँखें उस की मुंतज़िर हैं आज भी जैसे कल थे मुहाजिर हैं आज भी 'इश्क़-ए-सादिक़ तो लापरवाह है ना इश्क़-ए-ना-मुराद ही सही मगर ख़ुदा गवाह है ना इश्क़-ए-मजाज़ी ब-निस्बत इश्क़-ए-इलाही 'अज़ीम है क्या तुम सेे मोहब्बत करना जुर्म-ए-'अज़ीम है उस सेे पूछना था उस सेे पूछना था बहुत कुछ उस सेे कहना था बहुत कुछ कह नहीं पाया उस सेे कहना उस सेे बिछड़ के मैं रह नहीं पाया ऐसा नहीं है भुलाना नहीं चाहता हूँ चाहता हूँ ऐसा नहीं उस के सिवा किसी से मिलना मिलाना नहीं चाहता हूँ चाहता हूँ ऐसा भी नहीं दिखावा करने का शौक़ है मोहब्बत में आशिक़ बनने का शौक़ है मैं तो चाहता हूँ हर फूल को मसल देना मगर बस दिल नहीं करता उस सेे कहना उस के बिना चाँद तारे जुगनू फूल ख़ुशबू क्या उस मह-रू के सामने कोई ख़ुश-रू क्या सब मुक़द्दस होता है मोहब्बत में इश्क़ में बा-वज़ू क्या एक उसी की ख़्वाहिश थी इस दिल को जो पूरी न हो सकी अब तो जो मिल जाए ठीक अब हस्ब-ए-आरज़ू क्या उस सेे कहना मगर फिर भी दिल के एक छोटे से कोने में एक ख़्वाहिश ज़िंदा है उस को अपना कह के पुकारने की हर शब उस की नज़र उतरने की कहने की उस से कि तुम सेे मोहब्बत है मुझे तुम्हारी ज़रूरत है मुझे उस सेे कहना मैं ही नहीं उस को खिड़की दर-ओ-दीवार सब याद करते हैं उस के बारे में रात-रात भर पागल बात करते हैं मुझ सेे ज़्यादा क़लम टेबल पंखा रस्सी सब रोते हैं वो भी उसी की यादों में अक्सर खोए हुए होते हैं वो शर्ट जो उसे पसंद थी, नहीं शर्ट को वो पसंद थी, उस के जाते ही रंग छोड़ दिया इसने वो इत्र जो उस ने दिया था लगाने को कहती थी अब कहीं लगा के जाता हूँ तो ख़ुशबू नहीं आती वो ख़ुशबू इत्र की नहीं थी वो बहाना था महकती तो वो थी मेरे बदन में वो घड़ी जो उस ने दी थी रुक गई उसी दिन जिस दिन मैं वो बिछड़े थे ये दिल-घर उस का जो उस ने सजाया था और फिर तोड़ कर गई थी उस सेे कहना उसे देखने कई किराए दार आए थे काफ़ी अच्छी रक़म दे रहे थे मगर रहने ही नहीं दिए इस की दीवारें चिल्ला पड़ी मुझ पर हर एक मेरी चीज़ मेरी नहीं है अब उस सेे कहना सब उस का है अब सब उसी को चाहते हैं मुझ सेे ज़्यादा इन्हें उस की आदत लग गई है उस सेे कहना आज भी उस की तलाश रहती है वो नहीं मगर उस की याद पास रहती है किसी नए जोड़े को देख कर वो यहाँ होती मेरे कहने से पहले मेरी तन्हाई काश कहती है उस सेे कहना ये कोई इमोशनल ब्लैकमेलिंग नहीं है बस बताना था आज-कल मेरी तबीयत भी बहुत ख़राब रहती है आँखों में प्यास और होंठों पर शराब रहती है बहन तो गुज़र ही गई याद होगा पिताजी थोड़े टूट गए हैं घुटने जाम हो जाते हैं मम्मी का जी थोड़ा और कच्चा हो गया है और तो बस थोड़ी ख़राश रहती है कुछ अच्छा नहीं बनाया सालों से तब से बस जीने के लिए खाते हैं मुझे बड़े डरावने ख़्वाब आते हैं तुम तो कभी निकलती ही नहीं ज़ेहन से पूछना था मैं, बहन, माँ, भाई कोई भी, कभी भी याद आते हैं? उस सेे कहना किसी रोज़ कहीं भी कभी भी अगर मिलने आए तो लौट के मत जाना अगर जाना हो तो मत आना मेरे ये दिल के ज़ख़्म भर भी सकते हैं मगर एक और चोट से हम मर भी सकते हैं कोई पस-ओ-पेश ही नहीं इस बात पर तेरा दीदार ज़रूरी है तेरे साथ से इस लिए ही तो तेरी तस्वीर है आज भी आँसू-ओ-ख़लिश तक़दीर थे कल भी तक़दीर हैं आज भी कभी याद आए तो हाल पूछ लेना बुरा ही सही मेरे बारे में सोच लेना वैसे तो मैं ख़ुद ही जब याद बन जाऊॅंगा तब देखना बहुत याद आऊॅंगा उस सेे कहना बिछड़ गए तो क्या याद तो अब भी आती है लो फिर उस की याद आ गई — Chhayank Tyagi