संग रह जाते थे पानी पे ही लिख के राम का नाम
कृष्ण के छूने से यकसाँ बाँस बन जाते थे मुरली
उसके जितना तो कभी अच्छा नहीं था
मेरे चेहरे पे कोई चेहरा नहीं था
बे नसीबी है नहीं मेरी तो क्या है
खोया है वो जो अभी पाया नहीं था
उस तरफ़ वो सबको छाती से लगाती
इस तरफ़ मैंने कोई देखा नहीं था
उसके बिन ही जी रहा हूॅं मैं अभी तक
जिसके बिन मुझको कभी मरना नहीं था
तुम अगर मुझसे निभा लेती मोहब्बत
इतना घाटे का तो ये सौदा नहीं था
जब किसी ने ओ ख़ुशी कह के पुकारा
एक पल को मेरा दिल धड़का नहीं था
बिन ख़ता भी मैंने तो खाई है गाली
बद-मआशी का मेरा सपना नहीं था
राम से क्यों हारा लंका का वो रावण
उसकी जानिब उसका इक भैया नहीं था
ज़िंदगी जिसके लिए मैंने की ग़ारत
वो मगर मुझसे कभी बिछड़ा नहीं था
उसके मेरे हाल भी इक से थे क़िस्मत
उसपे मतला तो था पर मक़्ता नहीं था
उसका मैं हो के रहा सारा ही ता-उम्र
मेरा जो त्यागी कभी आधा नहीं था
हमेशा यही तो हुआ है मेरे साथ
मुकम्मल कोई कब रहा है मेरे साथ
उसे इश्क़ की इब्तिदा तो न मालूम
मगर इश्क़ की इंतिहा है मेरे साथ
नयन बोले आँसू हैं आँसू मेरे पास
अधर बोले फिर क़हक़हा है मेरे साथ
तू इस भीड़ को मार गोली मुझे देख
मुझे सिर्फ़ अब तू बता है मेरे साथ
ये अफ़वाहें हैं मत यक़ीं कर तू ख़ुद सोच
तुझे कब ही कोई दिखा है मेरे साथ
मुझे डर नहीं तेरी रंजिश से दुनिया
मेरा बाप अब ही खड़ा है मेरे साथ
सभी के सभी बेवफ़ा निकले 'त्यागी'
यहाँ बस मेरा दुख रहा है मेरे साथ
उसे बेवफ़ा मत कहो वो नहीं है
अगर है भी तो क्या ख़ुदा है मेरे साथ
आज कल तो ये हुनर भी आना चाहिए
लत लगा के अपनी छोड़ जाना चाहिए
उसने तो तुझे भुला दिया है कब का बस
अब तुझे भी उसको भूल जाना चाहिए
ज़िंदगी तो जाती है निभाने में वफ़ा
छोड़ने का क्या है बस बहाना चाहिए
उसकी बेवफ़ाई पे ही सिर्फ़ क्यूँ लिखो
उसकी आँखों पे भी शेर होना चाहिए
इस शनावरी पे नाज़ भी अहम है पर
ऐसी आँखों में तो डूब जाना चाहिए
हर दफ़ा ये क्या कि तुम ही रूठो इश्क़ में
अब तुम्हें भी तो कभी मनाना चाहिए
एक शख़्स रटने में लगे हैं साल दो
अब उसे भुलाने को ज़माना चाहिए
उम्र भर के मुंतज़िर को कुछ नहीं मिला
शायरों को बे-वफ़ा ही होना चाहिए
आप कहती हैं ख़ामोश हो जाता हूँ
मैं जो आँखों में मदहोश हो जाता हूँ
मैं हूॅं ग़ाफ़िल जो रहता हूॅं इक ख़्वाब में
तुमको लगता है बेहोश हो जाता हूँ
कल वो ग़ुस्सा थी और मैंने देखा नहीं
फिर तो छायांक ख़ामोश हो जाता हूँ
पहले इक डीपी पे नाज़ सा होता था
अब अगर देखूॅं ग़म-कोश हो जाता हूँ
वो मुझे इक दफ़ा कह दे अच्छा सुनो
मैं तो खिलके न गुल-पोश हो जाता हूँ
उसके बिन तो खंडर सा हूॅं मैं मेरा दिल
उससे मिलते ही फ़िरदौस हो जाता हूँ
एक साल
ओ मेरे दिल के टुकड़े
मेरी बहना मेरी बेटी मेरे बच्चे
आज एक साल हो गया
तुम्हें बाशिंदा ए अदम-आबाद हुए
मेरी छोटी-सी दुनिया को बर्बाद हुए
जैसे ये ख़ुशबू धूप अब्र-ओ-बाद हुए
तुम्हे आज़ाद हुए मुझे शब-ज़ाद हुए
तुमसे कोई विवाद हुए मुझे ना-मुराद हुए
इस दिल को ना शाद हुए
तुम्हें महज़ एक याद हुए
मेरी बेटी
आज एक साल हो गया
मुक़द्दर को बिगड़े हुए मुझे तुमसे बिछड़े हुए
इस घर को उजड़े हुए इस दिल के टुकड़े हुए
बैठा रहता हूँ मैं तेरी तस्वीर को पकड़े हुए
बैठी है तेरी याद दिल में दिल को जकड़े हुए
तेरे मेरे झगड़े हुए और मुझे तुझपे अकड़े हुए
अभागे बाप के मुखड़े से
एक आँख को लिकड़े हुए
अभागे भाई के कांधे से
एक बाज़ू को उखड़े हुए
मेरी बेटी
आज एक साल हो गया
ख़ुशियों को घर छोड़े हुए
ख़ुदा को मुक़द्दर फोड़े हुए
घर की तरफ़ सैलाब को मोड़े हुए
मेरी नींद को छीने ख़्वाब को तोड़े हुए
डाॅक्टर के पैरो में लौटे हुए हाथों को जोड़े हुए
तुझको ये दुनिया छोड़े हुए
मुझे दुनिया से सब नाते तोड़े हुए
मेरी बेटी
आज एक साल हो गया
घर में उदासी को छाए हुए
इन होंटों पर हॅंसी को आए हुए
पिताजी को क़िस्से सुनाए हुए
बगिया में फूलों को आए हुए
ऑंगन में सन्नाटा छाए हुए
पीठ पर तेरा चाटा खाए हुए
मुझको गाना गाए हुए
जी से कोई खाना खाए हुए
दिल को पत्थर करे हुए
याद में तेरी आँसू बहाए हुए
मेरी बेटी
आज एक साल हो गया
मुझे कुछ लिखे हुए तुझे कहीं दिखे हुए
मुझे चैन से सोए हुए तेरी याद में खोए हुए
तेरी आवाज़ सुने हुए तेरे साथ तारों को गिने हुए
तुझे मुझसे छीने हुए आज बारह महीने हुए
ख़ुश रंग ख़्वाबों को किसी नज़र की आग में जले हुए
हमारे आशियाँ के सूरज को ढले हुए
जिनमें मिस्मार हो गई झोपड़ी अपनी
उन ऑंधियों को चले हुए
इन आँखों और रुख़सारों को गिले हुए
मुझे तूझसे मिले हुए
मेरी बेटी
आज एक साल हो गया
भरने थे जो ज़ख़्म जिगर के
वक़्त के साथ सिर्फ़ गहरे हुए हैं
हम समंदर में डूबी उस कश्ती की राह में
आज भी किनारे पर ठहरे हुए हैं
हर किसी ने शुरू में कहा था
“हमे भी दर्द बस शुरू में रहा था”
अभी यक़ीन नहीं होगा दिल भी ग़मगीन नहीं होगा
एक वक़्त पर जा चुका है दिल मान जाता है
एक वक़्त के बाद हर दर्द दवा बन जाता है
मगर न जाने क्यों
ये दर्द तो बढ़ता जाता है
मुझे सुकून नहीं मिल पाता है
कैसी ज़ुल्मत बढ़ती जाती है
मेरी हिम्मत टूटती जाती है
जब लौट के तुम नहीं आती हो
ये दीवाली क्यों आ जाती है
मुझको ये मालूम भी है
लौट के नहीं कभी आते हैं
अब तुम जिस जहाँ में रहती हो
पर तुम कब जहाँ में रहती हो
तुम तो आब ओ हवा में बहती हो
ये तेरा भैया तेरे पापा तेरी मैया
ये चंदा तारे जुगनू दीपक फूल ओ कलियाँ
ये सूनी गलियाँ और हम सब
तुझको खोजते रहते हैं
हम सब तुझको सोचते रहते हैं
सबसे कहते रहते हैं
यहीं है वो कहीं नहीं गई है
वो मेरे दिल में रहती है
वो मुझसे मिलती रहती है
ख़्वाबों में
वीरान दिल के उजड़े गुलशन में
मेरे तन में मेरे मन में इस चमन में
होली के रंगों में पिचकारी में गुब्बारों में
दिवाली की फुलझड़ियो में चकरी में अनारों में
रंगोली के रंगों में दिए में लड़ियों में
खिड़की पर बैठी गिलहरी में चिड़ियों में
नौ रातों की नौ देवियों में जिमती है
पहले आरती करती थी अब कराती है
मुझको बेहद रुलाती है
मुझे भैया कह के बुलाती है
छत की कड़ी में दीवार की घड़ी में
हर पल टक-टक करती है
मेरे भीतर मेरे दिल के ऑंगन में खेल खेलती
वो हर पल बक-बक करती है
ठंडी रात के घोर सन्नाटे में वो मेरी ग़ज़लें गाती है
आज खुल्द में क्या-क्या हुआ रात को आके बताती है
मैं गले लगाने को उठता हूँ
आँख खुलती है गुम हो जाती है
ऐसा होते हुए
मुझको रोते हुए
एक साल हो गया