अश्क से मालूम हो गर इश्क़ की गहराइयों का
रब्त हो सैलाब से ता-उम्र ही शैदाइयों का
दास्ताँ सब ख़त्म है पे है दवामी फ़ैसला ये
क्या करेंगे हम भला अब आप की सच्चाइयों का
दिल गया जाँ भी गई हासिल नहीं दो गज़ ज़मीं भी
देखिए ये है सिला सब आप की अच्छाइयों का
क़ाइद-ए-साइल की साक़ी पूछते हो हैसियत तुम
मान रक्खो कुछ ‘तहम्मुल’ की ज़बर रुस्वाइयों का
— Dhiraj Singh 'Tahammul'















