शिकायत अब भला कैसे करूँँ मैं यार उस की
नज़र-अंदाज़ की है गलतियाँ हर बार उस की
कि हर इक जंग उस ने जीत ली आँखें दिखा कर
मयाँ से आज तक निकली नहीं तलवार उस की
नज़र इक दूसरे से हम मिला पाए न फिर भी
हमारे सामने आ कर रुकी थी कार उस की
कि अब जिस ओर चाहेगी मुझे ले जाएगी वो
सफ़ीना है मेरा पर यार है पतवार उस की
अगर वो छोड़ भी दे मुझ को तो हैरत नहीं है
बदलते वक़्त से भी तेज है रफ़्तार उस की
— Dipendra Singh 'Raaz'















